सना खान
राहुल अपनी कंपनी में सबसे तेज और पढ़ा-लिखा कर्मचारी माना जाता था। नई-नई जानकारियां जुटाना, हर विषय पर राय रखना और हर चर्चा में आगे रहना उसकी आदत थी। एक दिन कंपनी में एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट आया। राहुल ने इंटरनेट से ढेर सारी जानकारी इकट्ठा की, रिपोर्टें पढ़ीं और आंकड़ों का विश्लेषण किया। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय बिल्कुल सही है।
उसी टीम में श्याम भी था। उम्र में बड़ा, पढ़ाई में साधारण, लेकिन अनुभव में समृद्ध। उसने राहुल की प्रस्तुति ध्यान से सुनी और केवल इतना कहा, ‘जानकारी सही है, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और हैं।’ राहुल को लगा कि श्याम पुरानी सोच का आदमी है। उसने उसकी बात अनसुनी कर दी। कुछ महीनों बाद प्रोजेक्ट उम्मीद के मुताबिक, सफल नहीं हुआ। जो बातें कागजों और रिपोर्टों में सही लग रही थीं, वे वास्तविक परिस्थितियों में काम नहीं आर्इं। राहुल परेशान था। तब श्याम उसके पास आया और मुस्कुराते हुए बोला, ‘बेटा, जानकारी हमें बताती है कि क्या लिखा है, लेकिन समझदारी हमें बताती है कि क्या सही है।’ उस दिन राहुल को एहसास हुआ कि ज्ञान महत्वपूर्ण है, लेकिन अनुभव और विवेक के बिना वह अधूरा है। किताबें रास्ते दिखा सकती हैं, लेकिन उन रास्तों पर चलना और सही मोड़ चुनना समझदारी का काम है। तभी से उसने केवल जानकारी जुटाना ही नहीं, बल्कि उसे समझना भी शुरू किया। क्योंकि उसने सीख लिया था कि हर जानकारी, समझदारी नहीं होती।
जानकारी के समंदर में हर कोई खो जाता है,
मगर समझदारी का मोती हर किसी को नहीं मिल पाता है।
हर पढ़ा हुआ शब्द इंसान को ज्ञानी बनाता है,
पर सही पैâसला लेना तजुर्बा ही सिखाता है।
