सना खान
एक वृद्ध पिता अपने बेटे के साथ बाज़ार गए। बेटा अब एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर था। अच्छी तनख्वाह, बड़ा घर और महंगी गाड़ी-उसके पास वह सब कुछ था जिसे दुनिया सफलता कहती है। बाजार में उसकी नजर एक प्रसिद्ध ब्रांड की घड़ी पर पड़ी। उसने मुस्कुराते हुए पिता से कहा, ‘पापा, अगले महीने आपके जन्मदिन पर मैं आपको ऐसी ही घड़ी उपहार में दूंगा। अब आपकी पुरानी घड़ी बदलने का समय आ गया है।’ पिता ने अपनी कलाई पर बंधी पुरानी घड़ी की ओर देखा और बस मुस्कुरा दिए। कुछ दिनों बाद बेटे ने वह घड़ी खरीद ली। जन्मदिन पर उसने बड़े गर्व से वह डिब्बा पिता को दिया। पिता ने डिब्बा खोला और बेटे को गले लगाते हुए कहा, ‘बहुत सुंदर है बेटा।’ बेटे को लगा कि अब पिता अपनी पुरानी घड़ी उतार देंगे। लेकिन दिन बीत गए। एक सप्ताह फिर एक महीना, पिता की कलाई पर वही पुरानी घड़ी थी। एक दिन बेटे से रहा नहीं गया। उसने पूछा, ‘पापा, क्या आपको मेरी दी हुई घड़ी पसंद नहीं आई?’ पिता कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने अलमारी से महंगी घड़ी का डिब्बा निकाला और उसके पास अपनी पुरानी घड़ी रख दी। धीरे से बोले, ‘तुम्हारी घड़ी की कीमत लाखों में होगी, लेकिन इस घड़ी का मूल्य मैं कभी नहीं चुका सकता।’ बेटा हैरानी से उन्हें देखने लगा। पिता की आंखें नम हो गईं। ‘यह घड़ी मुझे तुम्हारी मां ने हमारी शादी की पहली सालगिरह पर दी थी। जब भी मैं इसे देखता हूं, उसका साथ याद आ जाता है।’ कमरे में सन्नाटा छा गया। पिता ने घड़ी को हाथ में लेते हुए कहा, ‘बेटा, कुछ चीजें समय नहीं बतातीं, वे बीता हुआ समय लौटा लाती हैं।’ पिता की बात सुनकर बेटे की आंखें भर आईं। उसने पहली बार उस पुरानी घड़ी को ध्यान से देखा। उसके पीछे उसे वर्षों का साथ, संघर्ष और प्रेम दिखाई दे रहा था। उस रात उसने अलमारी से मां की एक पुरानी तस्वीर निकाली। तस्वीर में मां मुस्कुरा रही थीं और पिता की कलाई पर वही घड़ी बंधी हुई थी। वह कुछ देर तस्वीर को देखता रहा। फिर उसने चुपचाप तस्वीर वापस रख दी। अब उसे समझ आ चुका था कि वह सिर्फ एक घड़ी नहीं, एक पूरी कहानी थी।
फलसफा यही है कि इंसान अक्सर चीजों की कीमत गिनता रहता है, जबकि उनका असली मूल्य उनसे जुड़ी भावनाओं में छिपा होता है। कीमत बाजार तय करता है, लेकिन मूल्य यादें तय करती हैं।
