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फलसफा : वक्त का आईना

सना खान

ऑफिस से बाहर निकलते हुए आरव के हाथ कांप रहे थे। दस साल की नौकरी के बाद आज उसे एक छोटा-सा लिफाफा थमाकर कह दिया गया था कि कंपनी को अब उसकी सेवाओं की जरूरत नहीं है।
जेब में बस कुछ हजार रुपए थे, लेकिन जिम्मेदारियां उससे कहीं बड़ी थीं। बूढ़े माता-पिता, पत्नी और सात साल की बेटी अनन्या-सबकी उम्मीदें उसी से जुड़ी थीं। उस रात नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। बैंक का कर्ज, घर का किराया और बेटी की पढ़ाई बार-बार उसके मन में उथल-पुथल मचा रहे थे। पत्नी ने उसकी खामोशी को पढ़ लिया।
‘क्या हुआ?’ उसने पूछा।
‘नौकरी चली गई है,’ आरव ने धीमी आवाज में कहा।
पत्नी ने उसका हाथ थामते हुए जवाब दिया, ‘मुश्किलें हमेशा नहीं रहतीं। हम साथ हैं, यही सबसे बड़ी ताकत है।’
दिन बीतते गए। नौकरी की तलाश जारी रही, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। तभी एक दिन उसकी छोटी-सी बेटी अपनी गुल्लक लेकर उसके पास आई और बोली, ‘पापा, आप उदास मत होइए, सब ठीक हो जाएगा।’
उस मासूम चेहरे को देखकर आरव की आंखें भर आर्इं। उसी शाम उसे अपनी पुरानी डायरी मिली, जिसके पहले पन्ने पर पिता ने लिखा था- ‘मुश्किल रास्ते अक्सर सबसे खूबसूरत मंजिल तक ले जाते हैं।’
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है कि इंसान अपनी ताकत को अच्छे दिनों में नहीं पहचानता। वक्त जब उसे परखता है, तब उसे एहसास होता है कि उसकी असली पूंजी बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि उसका हौसला और अपनों का साथ है।
शायद मुश्किलें हमें तोड़ने नहीं, बल्कि हमारी असली पहचान से मिलवाने आती हैं। क्योंकि जिंदगी का फलसफा यही कहता है कि जो इंसान बुरे वक्त में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता, वही एक दिन अपने मुकद्दर की कहानी खुद लिखता है।
आखिर में, वक्त सबका बदलता है; फर्क सिर्फ इतना है कि कोई मुश्किलों के आगे झुक जाता है और कोई उनसे सीखकर और मजबूत हो जाता है।

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