एम एम एस
२०२६ के विधानसभा चुनाव परिणाम भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और संघीय स्वरूप के लिए एक मिश्रित लेकिन चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। जहां केरल में इंडिया गठबंधन की शानदार जीत ने उम्मीद जगाई है, वहीं असम और पश्चिम बंगाल के नतीजे भाजपा के ध्रुवीकरण की राजनीति और संस्थागत हेर-फेर के खतरों को रेखांकित करते हैं।
लोकतंत्र की जीत
केरल में यूडीएफ की भारी जीत न केवल विपक्ष की मजबूती को दर्शाती है, बल्कि यह पीनाराई विजयन के व्यक्ति केंद्रित शासन के खिलाफ जनता का स्पष्ट जनादेश है। सकारात्मक पहलू केरल के मतदाताओं ने भाजपा की दक्षिण विस्तार की महत्वाकांक्षाओं पर स्पीडब्रेकर का काम किया है। चुनौती अब विपक्ष की प्राथमिकता केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला जैसे अनुभवी नेताओं के बीच नेतृत्व का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालकर सुशासन देना है।
संस्थागत प्रहार और ध्रुवीकरण
इन दो राज्यों में भाजपा की जीत को इंडिया गठबंधन लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी मानता है। पश्चिम बंगाल यहां भाजपा की जीत जनमत से ज्यादा दागी चुनावी प्रक्रिया का परिणाम प्रतीत होती है। लगभग २७ लाख मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाया जाना लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा पर हमला है। ममता बनर्जी और टीएमसी के खिलाफ भाजपा ने अपनी पूरी मशीनरी का प्रयोग किया जो स्वतंत्र चुनाव की धारणा को कमजोर करता है। असम हिमंत बिस्वा सरमा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और संसाधनों के पुनर्वितरण से सत्ता बरकरार रखी है। विपक्ष के लिए असम के नतीजे आत्ममंथन का विषय हैं। विशेषकर गौरव गोगोई की हार एक बड़ा वैचारिक नुकसान है।
एक नया राजनीतिक प्रयोग
तमिलनाडु में अभिनेता सी विजय की टीवीके का उदय द्रविड़ राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव है। हालांकि, इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल डीएमके का वोट शेयर पैâला हुआ था, लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले और चुनावी गणित के कारण टीवीके को अप्रत्याशित लाभ मिला। विपक्ष को अब राज्य में इस नई राजनीतिक चुनौती के अनुरूप अपनी रणनीति को फिर से परिभाषित करना होगा।
गठबंधन के लिए भविष्य की राह
ये चुनाव परिणाम स्पष्ट करते हैं कि भाजपा अब क्षेत्रीय अस्मिताओं को दरकिनार करने और संघवाद पर दबाव बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। अब देखने की कोशिश करते हैं कि इंडिया गठबंधन के दृष्टिकोण से भविष्य की चुनौतियां क्या-क्या हो सकती हैं और उसके पास अवसर क्या हैं। विपक्ष का पुनर्गठन टीएमसी और डीएमके जैसे क्षेत्रीय स्तंभों की चुनावी हार के बाद अब कांग्रेस के पास यह अवसर है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी राजनीति को और अधिक प्रभावी ढंग से संगठित करे। एकजुटता की आवश्यकता परिसीमन विधेयक जैसे मुद्दों पर जिस तरह विपक्ष ने संसद में भाजपा के एकतरफा पैâसलों का विरोध किया है, वैसी ही सक्रियता अब चुनावी मैदान में भी अनिवार्य है। संस्थागत सुरक्षा चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ी जैसे मुद्दों पर इंडिया गठबंधन को एक साझा कानूनी और राजनीतिक मोर्चा खोलना होगा।
निष्कर्ष: हालांकि, असम और बंगाल के नतीजे चुनौतीपूर्ण हैं लेकिन केरल की जीत साबित करती है कि जनता भाजपा के विकल्प के प्रति आशान्वित है। इंडिया गठबंधन आनेवाले समय में भारत की लोकतांत्रिक विविधता और संघीय अधिकारों की रक्षा के लिए और अधिक एकजुट होकर संघर्ष करेगा।
