के.पी. मलिक
नवंबर २०२५ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धार्मिक स्थलों के लगातार दौरों ने देश की राजनीति में एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठा नेता सचमुच आध्यात्मिक ऊर्जा की तलाश में है या फिर यह आस्था के नाम पर बुना गया एक सुनियोजित चुनावी ताना-बाना है?
हिंदुत्व की राजनीति
हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव-२०२५ में मोदी की भव्य उपस्थिति, ब्रह्मसरोवर पर महाआरती, करोड़ों दर्शकों के सामने लाइव प्रसारण, फिर उडुपी के श्रीकृष्ण मठ में लाखों लोगों के साथ सामूहिक गीता पाठ और अयोध्या राममंदिर पर ध्वजारोहण, ये सब सामान्य ‘धार्मिक यात्राएं’ नहीं हैं। यह एक ऐसा सांस्कृतिक-धार्मिक कॉम्बिनेशन है, जो सीधे राजनीतिक समय सारिणी के साथ मेल खाता है।
क्या इन यात्राओं का राजनीतिक संदर्भ: मंदिर यात्रा से वोट-यात्रा तक कहा जा सकता है? दरअसल, बिहार में एनडीए की ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा का उत्साह चरम पर है। नीतीश–मोदी की जोड़ी ने अमित शाह के चमत्कार से बिहार में ‘जाति और विकास’ का संतुलित नैरेटिव पेश करके चुनावी जमीन मजबूत की। अब पार्टी की निगाहें २०२६ में होनेवाले पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के चुनावों पर है। इन राज्यों में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव है। ऐसे में धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से हिंदू वोट बैंक को सांस्कृतिक एकता की डोर में बांधना भाजपा की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। उडुपी का गीता पाठ, तमिलनाडु के चोलास से जुड़ी सांस्कृतिक घटनाएं और पूर्व भारत में धार्मिक ध्वज-यात्राएं—सब एक ही लक्ष्य की ओर इशारा करते हैं: राजनीतिक विस्तार के लिए धार्मिक राष्ट्रवाद का पुनर्सक्रियकरण।
संघ–भाजपा के तालमेल के संकेत बहुत साफ दिखाई दे रहे हैं, मोदी का नागपुर दौरा और संघप्रमुख मोहन भागवत से ‘अनौपचारिक’ बातचीत को आरएसएस-भाजपा रिश्तों में गर्माहट बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है। अयोध्या में ध्वजारोहण के दौरान भागवत की मौजूदगी यह स्पष्ट कर देती है कि २०२६ के चुनावों के लिए भाजपा और संघ पूरी तरह एकजुट होकर मैदान में उतरनेवाले हैं। संघ की शाखाओं से लगातार निकलने वाला संदेश ‘सांस्कृतिक गौरव ही राष्ट्रीय शक्ति का मूल है’ सरकार की चुनावी भाषा से पूरी तरह मेल खाता दिख रहा है। यह तालमेल सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, यह राजनीतिक हिंदुत्व के पुनर्संगठन की कवायद है।
चुनावी हथियार!
सवाल है कि क्या धार्मिक आयोजनों से आर्थिक विफलताएं ढकी जा सकती हैं? विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी के मंदिर दौरे एक तरह का पॉलिटिकल कवर-फायर हैं, ताकि जनता की नजरें उन मुद्दों से हट जाएं जो सत्ता के लिए असहज हैं, जिनमें सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी का करीब २७ फीसदी तक पहुंचने का दावा, महंगाई से मध्यम वर्ग की कमर टूटना और देशभर के ६० फीसदी से ज्यादा लोगों के कृषि क्षेत्र में ठहराव, छोटे व्यापारियों की लगातार कमर टूटती अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश में लगातार गिरावट। ऐसे में जब प्रधानमंत्री लगातार आरती, ध्वजारोहण और महापाठ में व्यस्त दिखते हैं तो हम जैसे आलोचक पूछते हैं कि ‘क्या अर्थव्यवस्था को भी इसी तरह महाआरती और गीता पाठ से सुधारा जाएगा?’
अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और राजनीतिक ध्रुवीकरण। मोदी के धार्मिक कार्यक्रमों की भव्यता जहां हिंदू मतदाताओं में गर्व की भावना पैदा करती है, वहीं अल्पसंख्यक समुदाय में भय और असुरक्षा की धारणा गहरी होती जा रही है। विपक्ष इसे चुनावी ध्रुवीकरण की रणनीति बताता है। जहां एक तरफ अपनी पहचान पर जोर और दूसरी तरफ अल्पसंख्यक डर को अनदेखा करने की राजनीति चल रही है।
बहरहाल, यह मॉडल सिर्फ चुनावी रणनीति ही नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में एक नए तरह का विभाजन पैदा कर रहा है। ‘धार्मिकता बनाम लोकतंत्र?’ यह सवाल सिर्फ मोदी की यात्राओं का नहीं है, बल्कि यह उस राजनीति का सवाल है जहां आध्यात्मिक आस्था को चुनावी हथियार में बदला जा चुका है। धर्म और संस्कृति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जब मंदिर लोकतंत्र के समानांतर सत्ता केंद्र बनने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है और इसी सवाल ने आज भारत की राजनीति को दो ध्रुवों में बांट दिया है तो क्या प्रधानमंत्री की धार्मिक यात्राएं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की पहल हैं? या फिर लोकतांत्रिक बहस से ध्यान हटाकर चुनावी लाभ का मार्ग मेरे विचार से तो फिलहाल, मोदी की मंदिर यात्राएं श्रद्धा से ज्यादा रणनीति की ओर झुकी हुई प्रतीत होती हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
