के.पी. मलिक
लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवालों को सनसनीखेज आरोपों से नहीं, तथ्यों और दस्तावेजों से ताकत मिलती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), अमेरिका से मिलने वाली चंदे की रकम, इजरायली कूटनीतिक संपर्क और भारत की मतदाता सूचियों को लेकर उठे सवालों की पड़ताल भी इसी कसौटी पर होनी चाहिए। अक्टूबर २०२६ में सामने आई घटनाओं ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। क्या सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों के लिए जुटाई गई विदेशी रकम की पारदर्शिता पर्याप्त है? क्या राजनीतिक प्रभाव रखने वाले संगठनों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए? और क्या मतदाता सूची में नाम जोड़ने तथा हटाने की प्रक्रिया में समान मानदंड लागू किए जा रहे हैं? इन सवालों का जवाब किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष में नहीं, बल्कि सार्वजनिक दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच में छिपा है।
बेलिंगकैट की रिपोर्ट : रकम कितनी और सवाल क्या?
खोजी पत्रकारिता करने वाली संस्था बेलिंगवैâट ने ६ अक्टूबर २०२६ को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में अमेरिका की दो गैर-लाभकारी संस्थाओं `एकल विद्यालय फाउंडेशन ऑफ यूएसए और सेवा इंटरनेशनल को मिलने वाले अनुदानों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के मुताबिक, २०२० से २०२४ के दौरान इन दोनों संस्थाओं को कुल ११.७८ करोड़ डॉलर नहीं, बल्कि ११.७८ करोड़ डॉलर के बराबर ११७.८ मिलियन डॉलर का योगदान और अनुदान मिला। इसमें कम-से कम २४.४ मिलियन डॉलर डोनर-एडवाइज्ड फंड (डीएएफ) के माध्यम से आए। भारतीय मुद्रा में यह रकम विनिमय दर के अनुसार लगभग २०० करोड़ रुपए बैठती है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। पूरी ११७.८ मिलियन डॉलर की राशि को गुप्त फंडिंग बताना गलत होगा। डीएएफ के जरिए आने वाले अनुदानों में मूल दानदाता की पहचान सार्वजनिक दस्तावेजों से पता नहीं चल सकती, जबकि रकम देने वाली मध्यस्थ संस्थाएं और प्राप्तकर्ताओं के अनुदान संबंधी विवरण उपलब्ध हो सकते हैं। दानदाता की पहचान सार्वजनिक न होना अपने आप में अवैध फंडिंग का प्रमाण नहीं है, लेकिन पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल जरूर उठाता है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि एकल यूएसए ने २०२०-२४ के दौरान भारत में एकल विद्यालय परियोजना के लिए ३३.७ मिलियन डॉलर के विदेशी अनुदान दर्ज किए। सेवा यूएसए ने इसी अवधि में २९.७ मिलियन डॉलर के विदेशी अनुदान दर्ज किए। हालांकि, इन आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि पूरी रकम संघ को दी गई या किसी चुनाव को प्रभावित करने में इस्तेमाल हुई।
नागपुर में इजरायली राजनयिक की मौजूदगी
२० अक्टूबर को संघ के विजयदशमी कार्यक्रम में इजरायल के मुंबई स्थित महावाणिज्य दूत यानिव रेवाच शामिल हुए। उन्होंने भारत और इजरायल के बीच समान चुनौतियों तथा मूल्यों का उल्लेख किया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत से भी मुलाकात की थी। किसी राजनयिक का सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन जब किसी प्रभावशाली वैचारिक संगठन के साथ अंतरराष्ट्रीय संपर्क बढ़ते हैं, तब यह जानना उचित है कि सहयोग किन क्षेत्रों में है, उसके उद्देश्य क्या हैं और क्या किसी प्रकार की वित्तीय साझेदारी भी मौजूद है। यहां तथ्य और अनुमान के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। उपलब्ध जानकारी इन घटनाओं को किसी गुप्त अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ का प्रमाण नहीं बनाती।
मतदाता सूची और विदेशी धन यानि दो अलग जांचें
फॉर्म-७ के माध्यम से मतदाता सूची से नाम हटाने का अनुरोध किया जा सकता है। इसका दुरुपयोग हुआ है या नहीं, यह प्रत्येक मामले के प्रमाण, चुनाव आयोग की जांच और संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी अवसरों के आधार पर तय होना चाहिए। विदेशी चंदे के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। किसी संस्था के राजनीतिक या वैचारिक संबंधों के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन उसे पारदर्शिता और कानून से ऊपर भी नहीं रखा जा सकता। यदि किसी संगठन को विदेशी अनुदान मिला है, तो उसकी वास्तविक प्राप्ति, खर्च, लाभार्थी और वैधानिक अनुपालन की जांच होनी चाहिए। यही नियम सत्ता समर्थक और सत्ता विरोधी, दोनों प्रकार के संगठनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
जवाबदेही चुनिंदा नहीं हो सकती
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि विदेशी अनुदानों की निगरानी के नियम सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू हो रहे हैं या नहीं। डोनर-एडवाइज्ड फंड के माध्यम से धन देने वाले तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? क्या चुनाव आयोग मतदाता सूची से नाम हटाने की शिकायतों का सार्वजनिक, स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट करा सकता है? लोकतंत्र में असली संकट केवल गुप्त धन नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जिसमें शक्तिशाली लोगों से सवाल पूछना कठिन और कमजोर लोगों से जवाब मांगना आसान हो जाए। संघ हो, सरकार हो, विदेशी संस्था हो या कोई राजनीतिक दल। किसी को भी जांच से परे नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन आरोप को प्रमाण और संयोग को साजिश बताना भी कोई पत्रकारिता नहीं है। जाहिर तौर पर देश को सनसनी नहीं, दस्तावेज चाहिए; राजनीतिक शोर नहीं, स्वतंत्र जांच चाहिए और सबसे बढ़कर, कानून का समान अनुपालन चाहिए। आखिर सवाल सीधा है कि यदि विदेशी धन का उपयोग पूरी तरह वैध और पारदर्शी है, तो उसकी निष्पक्ष जांच से डर कैसा? और यदि अनियमितता है, तो कार्रवाई करने में देरी क्यों?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
