के.पी. मलिक
भारतीय राजनीति में कुछ संसदीय सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे देश की राजनीतिक दिशा और लोकतांत्रिक संरचना को प्रभावित करनेवाले ऐतिहासिक पड़ाव बन जाते हैं। जुलाई २०२६ में शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र भी ऐसे ही एक संभावित मोड़ के रूप में पहुंचता देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों, पत्रकारों और विपक्षी दलों के बीच इस बात को लेकर गंभीर चर्चा है कि क्या यह सत्र भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों का मंच बन सकता है।
दरअसल, इस चर्चा की पृष्ठभूमि पिछले कुछ वर्षों की राजनीतिक घटनाओं में छिपी हुई है। देश ने देखा है कि कई बड़े विपक्षी दलों को तोड़ने, दल-बदल और नेतृत्व संघर्ष की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तोड़ना हो या अन्य राज्यों में विपक्षी नेताओं का सत्ता पक्ष की ओर झुकाव, इन घटनाओं ने भारतीय राजनीति के शक्ति संतुलन को बदल दिया है। लोकतंत्र में दल-बदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह एक व्यापक प्रवृत्ति के रूप में दिखाई देने लगे, तब उसके दूरगामी राजनीतिक परिणामों पर चर्चा स्वाभाविक हो जाती है।
यही कारण है कि अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि संसद में संख्याबल केवल सरकार चलाने का साधन नहीं होता, बल्कि वह बड़े विधायी और नीतिगत परिवर्तनों का आधार भी बन सकता है। यदि किसी सरकार के पास पर्याप्त राजनीतिक समर्थन हो, तो वह ऐसे कानून और नीतियां लागू कर सकती है जो देश की प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डालें। इसलिए विपक्ष को कमजोर किए जाने की स्थिति और सत्ता पक्ष की बढ़ती संसदीय ताकत को केवल चुनावी सफलता के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की संभावित राजनीतिक दिशा से जोड़कर भी समझा जा रहा है।
आगामी मानसून सत्र को लेकर उठ रही आशंकाओं और चर्चाओं का मूल कारण भी यही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस अवसर का उपयोग महत्वपूर्ण विधेयकों या नीतिगत प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकती है। हालांकि, अभी तक ऐसे किसी विशेष कदम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी राजनीतिक हलकों में यह बहस तेज हो गई है कि आने वाले महीनों में संसद केवल बहस का मंच नहीं, बल्कि बड़े सत्ता उपयोगी निर्णयों का केंद्र बन सकती है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल विपक्ष की भूमिका को लेकर खड़ा होता है। लोकतंत्र में विपक्ष केवल चुनाव हारने वाले दलों का समूह नहीं होता, बल्कि वह सत्ता के संतुलन का आवश्यक स्तंभ होता है। उसका कार्य सरकार की नीतियों की समीक्षा करना, जनता की चिंताओं को संसद तक पहुंचाना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। लेकिन जब विपक्ष स्वयं राजनीतिक संकट, तोड़फोड़ और संख्या बल की कमजोरी से जूझ रहा हो, तब उसकी रणनीति क्या होनी चाहिए?
एक राजनीतिक विचारधारा यह कहती है कि विपक्ष को संसद के भीतर संघर्ष जारी रखना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर रहकर सवाल उठाना, बहस करना और जनता की आवाज को रिकॉर्ड पर रखना लोकतंत्र की मूल भावना है। दूसरी ओर कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता और विश्लेषक मानते हैं कि यदि संसदीय अंकगणित पूरी तरह सत्ताधारी दलों के पक्ष में झुक जाए तो विपक्ष को सड़कों पर उतर कर जनता के बीच जाकर व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना चाहिए। क्योंकि लोकतांत्रिक संघर्ष केवल संसद की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रह सकता।
हालांकि, इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विपक्ष संसद की भूमिका को कम महत्व देता है या स्वयं को संस्थागत राजनीति से दूर कर लेता है, तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श और कमजोर हो सकता है। लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं में भी निहित होती है, जो सत्ता को जवाबदेह बनाती हैं। इसलिए विपक्ष के सामने चुनौती केवल विरोध की नहीं, बल्कि प्रभावी और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने की भी है।
वास्तव में लोकतंत्र की मजबूती केवल राजनीतिक दलों पर निर्भर नहीं करती। जनता की जागरूकता, मीडिया की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिक समाज की सक्रियता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। जब नागरिक राजनीतिक घटनाओं को समझते हैं, प्रश्न पूछते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं, तभी संस्थाओं का संतुलन बना रहता है। इसलिए आने वाले महीनों में केवल संसद ही नहीं, बल्कि समाज की राजनीतिक चेतना भी परीक्षा के दौर से गुजरेगी।
बहरहाल, आज भारतीय राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल किसी एक दल की हार या जीत का नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने संतुलन, स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को बनाए रखने में सफल रहेंगी? क्या विपक्ष अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर पाएगा? और क्या जनता लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अपनी सक्रिय भागीदारी बनाए रखेगी? इन सवालों के उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि आगामी मानसून सत्र सिर्फ एक नियमित संसदीय सत्र नहीं माना जाएगा। उस पर पूरे देश की निगाहें होंगी, क्योंकि उसके भीतर होने वाली बहसें, निर्णय और राजनीतिक रणनीतियां आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यही कारण है कि यह सत्र केवल विधायी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और उसकी संस्थागत शक्ति की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी माना जा रहा है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं।)
