मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : कांग्रेस ही है भाजपा का विकल्प

पॉलिटिका : कांग्रेस ही है भाजपा का विकल्प

के.पी. मलिक

भारतीय राजनीति में एक प्रश्न बार-बार लौटकर आता है कि क्या कांग्रेस पार्टी आज भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सबसे बड़ा और सबसे विश्वसनीय विकल्प है? यह सवाल नया नहीं है, लेकिन हाल के महीनों में इसे फिर से प्रमुखता मिली है। इसकी एक वजह विपक्ष के नेता राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और दूसरी वजह इतिहासकार एवं लेखक ‘रामचंद्र गुहा’ द्वारा राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणियां हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह बहस ऐसे समय में सामने आई है, जब कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक छवि को काफी हद तक बदलने में सफलता हासिल की है। भारत जोड़ो यात्रा, भारत जोड़ो न्याय यात्रा, संसद में आक्रामक हस्तक्षेप और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर लगातार मुखरता ने उन्हें पहले की तुलना में अधिक गंभीर राजनीतिक नेता के रूप में स्थापित किया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि राहुल गांधी पर दोबारा वही पुराने प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं, जिन्हें वर्षों से उनके विरोधी उठाते रहे हैं।
सिर्फ आलोचना
रामचंद्र गुहा की आलोचना का मूल तर्क यह है कि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमजोर है, नेतृत्व संकट से जूझ रही है और राहुल गांधी अभी तक खुद को एक निर्विवाद राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित नहीं कर पाए हैं, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। क्या यह आलोचना वास्तव में कोई नया राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है या फिर यह वही तर्क है जो पिछले एक दशक से भाजपा समर्थक राजनीतिक विमर्श और मुख्यधारा मीडिया के एक हिस्से द्वारा दोहराए जाते रहे हैं? राहुल गांधी को लंबे समय तक ‘अनिच्छुक नेता’, ‘अपरिपक्व राजनेता’, ‘चुनावी रूप से असफल’ और ‘गंभीरता की कमी वाले राजनेता’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन २०२४ के लोकसभा चुनावों के बाद राजनीतिक वास्तविकताएं बदली हैं। कांग्रेस ने अपनी सीटें बढ़ार्इं, विपक्षी गठबंधन अधिक प्रभावी दिखा और राहुल गांधी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लौटे। यही कारण है कि आलोचकों के सामने चुनौती यह है कि वे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का मूल्यांकन पुराने राजनीतिक प्रâेमवर्क से नहीं कर सकते।
राहुल की लोकप्रियता बढ़ी
लोकप्रियता का आकलन केवल चुनावी परिणामों से नहीं होता। राजनीतिक प्रभाव, जनसंपर्क क्षमता और वैचारिक उपस्थिति भी महत्वपूर्ण कारक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और कॉर्पोरेट प्रभाव जैसे मुद्दों को लगातार राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया है। उनके समर्थकों का तर्क है कि राहुल गांधी की सबसे बड़ी उपलब्धि भाजपा को उसके पसंदीदा सांस्कृतिक और पहचान-आधारित विमर्श से हटाकर आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर जवाब देने के लिए मजबूर करना रही है। हालांकि, आलोचक अब भी यह कहते हैं कि व्यक्तिगत लोकप्रियता और चुनावी सफलता में अंतर होता है। उनके अनुसार राहुल गांधी के प्रभाव में वृद्धि अवश्य हुई है, लेकिन यह अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है जहां उन्हें नरेंद्र मोदी के समान राष्ट्रीय जनाधार वाला नेता कहा जा सके। सच्चाई संभवत: इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं स्थित है।
कांग्रेस बनाम भाजपा
भारतीय राजनीति में ‘विकल्प’ का अर्थ केवल चुनाव लड़ना नहीं होता। विकल्प का अर्थ है एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत करना। भाजपा राष्ट्रवाद, मजबूत नेतृत्व, केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया और हिंदुत्व आधारित राजनीतिक पहचान का मॉडल प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर कांग्रेस संविधानवाद, सामाजिक न्याय, बहुलतावाद, संघीय ढांचे और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को अपने राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखने का प्रयास करती है। यही कारण है कि कांग्रेस के समर्थक कहते हैं कि संगठनात्मक कमियों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के सामने वैचारिक विकल्प देनेवाली एकमात्र पार्टी कांग्रेस ही है। हालांकि, आलोचक यह तर्क देते हैं कि केवल वैचारिक दावे पर्याप्त नहीं हैं। जब तक कांग्रेस राज्य स्तर पर मजबूत संगठन नहीं खड़ा करती और क्षेत्रीय दलों के साथ अपने संबंधों को स्पष्ट नहीं करती, तब तक उसे भाजपा के वास्तविक विकल्प के रूप में स्वीकार करना कठिन होगा।
मीडिया की भूमिका
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय मीडिया की भूमिका है। पिछले एक दशक में बार-बार यह आरोप लगाया गया है कि मुख्यधारा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार की उपलब्धियों को व्यापक कवरेज देता है, जबकि विपक्षी गतिविधियों को सीमित या नकारात्मक संदर्भ में प्रस्तुत करता है। यह आरोप केवल विपक्षी दलों द्वारा नहीं लगाया गया। अनेक मीडिया शोधकर्ताओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर काम करने वाले विश्लेषकों ने भी इस विषय पर चिंता व्यक्त की है। प्रश्न यह नहीं है कि राहुल गांधी या कांग्रेस की आलोचना होनी चाहिए या नहीं। लोकतंत्र में विपक्ष की कठोर समीक्षा आवश्यक है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वही मानदंड भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर भी समान रूप से लागू होते हैं? यदि विपक्ष की हर रणनीति, हर बयान और हर संगठनात्मक कमजोरी पर विस्तृत चर्चा होती है तो क्या सरकार की नीतियों, आर्थिक दावों, संस्थागत नियुक्तियों, बेरोजगारी, कृषि संकट और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दों पर भी उतनी ही गहन जांच होती है? यही वह प्रश्न है, जो मीडिया की निष्पक्षता पर चल रही बहस के केंद्र में है।
क्या संतुलन मौजूद है
एक स्वस्थ लोकतंत्र में दो चीजें साथ-साथ चलनी चाहिए पहली, विपक्ष की आलोचनात्मक समीक्षा। दूसरी, सत्ता की कठोर जवाबदेही। यदि मीडिया केवल विपक्ष की कमियों को उजागर करे और सत्ता से कठिन प्रश्न पूछने से बचे तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता है। उसी प्रकार यदि विपक्ष को आलोचना से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर हो जाता है इसलिए वास्तविक मुद्दा राहुल गांधी की आलोचना नहीं है। वास्तविक मुद्दा आलोचना के मानकों में समानता है।
बहरहाल, कांग्रेस भाजपा का विकल्प है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय टीवी स्टूडियो, अखबारों के संपादकीय पन्नों या सोशल मीडिया अभियानों से नहीं होगा। इसका निर्णय मतदाता करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी को लेकर राजनीतिक विमर्श एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
अब बहस केवल उनकी व्यक्तिगत क्षमता पर नहीं, बल्कि इस प्रश्न पर भी है कि क्या भारत में एक प्रभावी विपक्ष मौजूद है और क्या उसे निष्पक्ष राजनीतिक अवसर मिल रहे हैं। रामचंद्र गुहा की आलोचना इस बहस का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों को समान कसौटी पर परखा जा रहा है। यदि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत जवाबदेही है तो वह केवल विपक्ष के लिए नहीं बल्कि सत्ता के लिए भी समान रूप से लागू होना चाहिए, यही किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

अन्य समाचार