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प्रहार मूवी रिव्यू : इंसाफ की जंग, जज्बे की दहाड़ और राजकुमार राव का दमदार प्रहार

निर्देशक: अविनाश अरुण
कलाकार: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी
अवधि: १४० मिनट
रेटिंग: ४

कुछ लड़ाइयां अदालत में लड़ी जाती हैं, लेकिन उनका असर घर की चारदीवारी तक पहुंचता है। प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम इसी कड़वे सच को पर्दे पर उतारती है। अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी यह फिल्म २६/११ मुंबई आतंकी हमलों के बाद चली कानूनी लड़ाई को सामने लाती है। हालांकि, इसकी दिलचस्पी केवल गुनहगार को सजा दिलाने तक सीमित नहीं है। फिल्म उस इंसान की जिंदगी में भी झांकती है, जो न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते अपने निजी रिश्तों के लिए वक्त निकालना भूल जाता है।
फिल्म की कहानी सरकारी वकील उज्ज्वल निकम और अजमल कसाब के मुकदमे के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके साथ १९९३ के बॉम्बे बम धमाकों से जुड़े कानूनी संदर्भ भी सामने आते हैं। अदालत में हर दलील के पीछे एक बड़ी जिम्मेदारी है और हर फैसले का महत्व सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहता। फिल्म इसी तनाव को धीरे-धीरे बढ़ाती है और दर्शकों को याद दिलाती है कि न्याय की प्रक्रिया में धैर्य, रणनीति और सबूतों की कितनी अहम भूमिका होती है।
इस कहानी का दूसरा पहलू निकम की निजी जिंदगी है। अपने काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जितनी मजबूत है, परिवार के साथ भावनात्मक जुड़ाव उतना ही उलझा हुआ नजर आता है। खासकर बेटे अनिकेत के साथ उनका रिश्ता फिल्म को एक अलग गहराई देता है। बेटा अपने पिता से सीखने के साथ उनका स्नेह और पहचान भी चाहता है, लेकिन निकम के लिए पेशेवर अनुशासन अक्सर भावनाओं से ऊपर दिखाई देता है। यही टकराव फिल्म को महज एक कोर्टरूम ड्रामा बनने से बचाता है।
राजकुमार राव उज्ज्वल निकम के किरदार में बेहद संयमित और प्रभावशाली नजर आते हैं। उनकी अदाकारी में न तो जरूरत से ज्यादा आक्रामकता है और न ही हीरो बनने की कोई जल्दबाजी। असरदार डायलॉग डिलीवरी, चेहरे के भाव और अदालत में उनकी मौजूदगी किरदार को विश्वसनीय बनाते हैं। खास बात यह है कि राव निकम के आत्मविश्वास के साथ उनकी भावनात्मक सीमाओं को भी सामने लाते हैं। अदालत में दृढ़ रहने वाला शख्स घर में अपनी बात कहने में क्यों पीछे रह जाता है, यही विरोधाभास उनके अभिनय को खास बनाता है।
ललित प्रभाकर ने कसाब के किरदार में असहज करने वाला प्रभाव पैदा किया है। वहीं, सिकंदर खेर बचाव पक्ष के वकील के रूप में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। जयदीप अहलावत अपने किरदार में गंभीरता और गहराई लाते हैं। वामिका गब्बी हमे ज्योति निकम के रोल में नजर आती है, वह फिल्म को पारिवारिक और भावनात्मक आधार देती हैं, जबकि आशीष विद्यार्थी जज के किरदार में जरूरी गरिमा बनाए रखते हैं। हर कलाकार को अच्छे से लिखा और दर्शाया गया है, जो फिल्म को मजबूत बनाता है.
अविनाश अरुण ने डेब्यू डायरेक्टर के तौर पर शानदार फिल्म बनाई है। अरुण ने कोर्टरूम की बहस को दिलचस्प बनाये रखा, कही कोई लम्बे और बोरिंग भाषण नहीं है, बात तर्क और सबूतों की होती है, इसी के चलते अरुण ने फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर ज्यादा भारी नहीं रखा है, फिल्म का म्यूजिक एक्टर्स की परफॉरमेंस को कॉम्पलिमेंट करता, ना की हावी होने की कोशिश करता है।
हालांकि फिल्म १४० मिनट लम्बी है, लेकिन एक भी डल या बोरिन मोमेंट नहीं है, फिल्म पहले सीन से लेकर आखिरी सीन तक अपनी पकड़ और रफ्तार बनाये रखती है। प्रहार असली घंटनाओ पर आधारित कोर्ट-ड्रामा है, जो हमें कसाब से जुड़े केस की कानूनी प्रक्रिया और उस उज्जवल के संघर्ष की कहानी दिखाता है, जिसके बारे में ज़्यादा लोग नहीं जानते।
प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम एक प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामा है, जो न्याय की लड़ाई को इंसानी रिश्तों और निजी त्याग के नजरिए से देखती है। राजकुमार राव का सधा हुआ अभिनय, दमदार सहायक कलाकार और अविनाश अरुण का नियंत्रित निर्देशन, इसे देखने लायक बनाते हैं। फिल्म यह भी समझाती है कि न्याय की राह में केवल विरोधियों से लड़ना काफी नहीं होता, कई बार अपने भीतर और अपने रिश्तों में उठते सवालों का सामना भी करना पड़ता है। अगर आपको गंभीर विषयों पर बनी फिल्में, मजबूत अभिनय और ऐसी कहानियां पसंद हैं जो थिएटर से निकलने के बाद भी दिमाग में बनी रहें, तो प्रहार आपकी वॉचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए।

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