मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर :  लोकतंत्र की दूसरी टांग भी टूटी?

प्रणवाक्षर :  लोकतंत्र की दूसरी टांग भी टूटी?

प्रणव प्रियदर्शी

हाल में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए जितनी बड़ी उपलब्धि हैं, विपक्षी खेमे के लिए उतना ही बड़ा झटका साबित हुए हैं। जनसंघ के पहले अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में अपनी पार्टी की सरकार बनते देखना बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं का पुराना सपना रहा है। जाहिर है, चाहे जितने भी जतन करने पड़े हों, २०२६ में पश्चिम बंगाल पर आखिरकार अपना कब्जा होना बीजेपी के लिए बहुत बड़ी बात है।
हमले से फूट तक
सो, इस जीत ने अगर बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया या उन्हें खुशी मनाने का मौका दिया तो यह स्वाभाविक था। लेकिन बीजेपी खेमे का उत्साह खुशी मनाने तक सीमित नहीं रहा। जल्दी ही तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं और कार्यालयों पर हमले की खबरें आने लगीं। अभी इन खबरों के मायने समझने की कोशिश चल ही रही थी कि टीएमसी में बड़ी फूट की खबरें आने लगीं।
हाथ से निकली पार्टी
कुछ ही समय में स्पष्ट हो गया कि जिसे फूट माना जा रहा था, वह विभाजन से भी बड़ा कुछ है। चुनाव में मिली हार से ममता संभलें, उससे पहले ही पूरी पार्टी उनके हाथ से निकलती हुई दिखने लगी। रितब्रत बनर्जी की अगुआई में पार्टी के एक बड़े धड़े ने अपनी राह अलग कर ली। इस फूट को स्वत:स्फूर्त तो खैर कोई नहीं कह रहा था, लेकिन जिस तेजी से स्पीकर ने इस धड़े के दावों को मान्यता दी, उससे रहा-सहा संदेह भी दूर हो गया।
अदालत की राह
इससे पहले महाराष्ट्र में कुछ इसी तरह का ड्रामा देश देख चुका था। शिवसेना और एनसीपी दोनों पार्टियों में फूट के पीछे केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी की ताकत थी और उस ताकत का प्रदर्शन बीजेपी नेतृत्व ने जिस नंगई के साथ किया, वह संवैधानिक नैतिकता में यकीन रखनेवाले किसी भी नागरिक को सिहरा देने के लिए काफी था। अब तृणमूल ने भी स्पीकर के पैâसले को अदालत में चुनौती देने की बात कही है। लेकिन यह मामला मूलत: राजनीतिक है। राजनीतिक मामलों को कानूनी लड़ाई के सहारे हल करने की कोशिशें कभी-कभी कुछ तात्कालिक राहत दे भी दें तो वे समस्या का स्थायी हल नहीं साबित होतीं।
सबसे पुरानी सहयोगी
नरेंद मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी ने जिस तरह की आक्रामकता दिखाई है, वह विपक्षी दलों तक सीमित नहीं रही है। शिवसेना तो एक जमाने में उसकी सहयोगी पार्टी ही थी। जब कोई पार्टी बीजेपी के साथ नहीं आना चाहती थी, तब बालासाहेब ने उससे हाथ मिलाया था। १९८५ से दोनों दलों में गठबंधन था। लेकिन मोदी युग में आने के बाद बीजेपी ने उस सबसे पुराने सहयोगी दल की भी जड़ काटने में संकोच नहीं किया।
नीतीश की दुर्गति
बिहार में नीतीश कुमार का हाल भी सब देख ही रहे हैं। बिहार की राजनीति में बारी-बारी उलटते-पलटते हुए दोनों पक्षों को साधे रखने का कमाल नीतीश कुमार लंबे समय तक दिखाते रहे। लेकिन पिछले विधानसभा में नतीजे ऐसे आए कि नीतीश कुमार के सामने बीजेपी का कोई विकल्प ही नहीं रहा। विकल्प खत्म होते ही उनकी पूछ भी खत्म हो गई। नतीजा यह कि बिना कोई चूं-चपड़ किए उन्होंने सम्राट चौधरी के लिए मुख्यमंत्री पद खाली कर दिया।
कोई नुकसान नहीं
ऐसे कई और उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन बात कुल मिलाकर यही है कि बीजेपी विरोधी दलों के लिए जितनी खतरनाक रही है, सहयोगियों के लिए भी उतनी ही घातक साबित हुई है। और यह एक राजनीतिक मसला इसलिए है, क्योंकि ऐसा करना उसे राजनीतिक तौर पर फायदेमंद लगता रहा है। विपक्षी दल या उससे आहत होने वाले सहयोगी दल उसे यह अहसास नहीं करा सके कि अंतत: ऐसे कदमों का भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
कठपुतली विपक्ष
लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल पार्टी का जो हश्र हुआ है, वह बीजेपी या विपक्षी दलों के लिहाज से ही नहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से भी अहम है। अब तक मोदी सरकार जिस तरह की भी उठा-पटक करती थी, उसका मकसद सत्ता पर कब्जा करना होता था। विपक्ष की जगह बची रहती थी। यह पहला मौका है, जब केंद्र में सत्तारुढ़ पार्टी ने येन-केन प्रकारेण चुनाव तो जीत ही लिया, उसके बाद विपक्ष की जगह भी प्रतिद्वंद्वी के लिए नहीं छोड़ी। वहां भी अपनी कठपुतली बैठा दी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)

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