सामना संवाददाता / मुंबई
एक तरफ केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ ‘महायुति’ सरकार युवाओं को लाखों नौकरियां देने का दम भर रही है, दूसरी ओर उसकी नीतियों से हजारों गरीब परिवारों पर संकट टूट पड़ा है। इस कारण ४,००० से अधिक कर्मचारियों का ‘निवाला’ छिन गया है। ये लोग पिछले ८० दिनों से अपने रोजगार के लिए सड़कों पर उतर कर संघर्ष कर रहे हैं।
बेरोजगारों को नौकरी देना तो दूर की बात है, सरकारी कर्मचारियों की इस गंभीर पीड़ा और संघर्ष पर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी चुप्पी साध रखी है। यह मामला सिर्फ रोजगार छीनने का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे गरीबों के पेट पर लात मारने का है, जिसकी गूंज अब राजनीतिक गलियारों में सुनाई देने लगी है।
बता दें कि आदिवासी विकास विभाग की आश्रमशालाओं में कार्यरत लगभग ४,००० शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चितता के घेरे में है। सरकार द्वारा इनकी नौकरियां समाप्त कर एक निजी कंपनी के माध्यम से महज १,७९१ पदों पर भर्ती का निर्णय लिए जाने के विरोध में शुरू हुआ धरना आंदोलन अब ८० दिन पूरे कर चुका है। लेकिन सरकार के दरबार में उन्हें न्याय नहीं मिल सका। आंदोलन की शुरुआत से पहले कर्मचारियों ने आदिवासी विकास मंत्री डॉ. अशोक उईके से चर्चा का प्रयास किया, लेकिन उनकी बात नजरअंदाज कर दी गई। इसके बाद से ही ये कर्मचारी आदिवासी आयुक्तालय के सामने धरने पर डटे हैं। धूप-बारिश झेलते हुए सड़क पर बनी अस्थाई झोपड़ियों में रहकर और सामूहिक भोजन करते हुए यह आंदोलन अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है।
‘महापंचायत’ का आयोजन
समग्र आदिवासी समाज ने नासिक में पहली ‘आदिवासी महापंचायत’ का आयोजन किया, जहां १,१६५ से अधिक प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों को राष्ट्रपति और राज्यपाल तक पहुंचाया जाएगा।
