लोकमित्र गौतम
२१वीं सदी को हम तकनीक, विकास और वैश्वीकरण की सदी कहते हैं। कहा जा रहा है कि इस सदी में बड़े-बड़े मसले बिजनेस की टेबल में बैठकर हल हो जाते हैं। कहने का मतलब २१वीं सदी का नाम लेने के बाद अगर कोई १८वीं और १९वीं सदी के बर्बर अतीत का जिक्र करे तो बिल्कुल अटपटा लगेगा। लेकिन हकीकत क्या है, जरा हकीकत देखिए। भले इस सदी को वैश्वीकरण और सहनशीलता की सदी कह रहे हों, लेकिन हाल के सालों में पत्रकारों की जिस बर्बर तरीके से हत्याएं की जा रही हैं, खुलेआम उन पर बम फेंक दिए जाते हैं, ऐसा इतिहास में शायद ही कभी पहले हुआ हो। महज १० दिनों के अंदर गाजापट्टी के अंदर दो बार पत्रकारों पर वीभत्स हमला हुआ है। पहली बार ६ पत्रकारों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया और महज एक हफ्ते के बाद ही दूसरी बार यहीं पर हुए एक ऐसे हमले में ५ पत्रकारों ने फिर मौके पर दम तोड़ा। २५ अगस्त २०२५ को गाजापट्टी के एक अस्पताल पर पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह इजरायल ऑन वैâमरा हवाई हमला कर रहा है। गाजापट्टी के इस नासिर अस्पताल पर इजरायल के हवाई हमले में २० लोगों ने ऑन वैâमरा दम तोड़ दिया, जिनमें ५ पत्रकार भी थे। पिछले एक हफ्ते के भीतर पत्रकारों पर यह दूसरा बर्बर हमला है।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हाल के दिनों में पत्रकारिता कितनी अपमानजनक और जोखिमभरा पेशा बन चुकी है। ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट २०२५ के मुताबिक, इस समय दुनिया में ६० सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, जिनकी रिपोर्ट चाहे अनचाहे पत्रकारों को करनी ही पड़ती है और इस दौरान सरकारें और सेनाएं बेरहमी से कलम के इन सिपाहियों को मौत की नींद सुला रही हैं। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) के मुताबिक, साल २०२४ में दुनियाभर के १२४ बेकसूर कलमकार सशस्त्र संघर्ष के शिकार हुए थे। तीन दशकों में संघर्ष के क्षेत्र में पत्रकारों की ये सबसे ज्यादा मौतें थीं। हैरान करनेवाली बात यह थी कि इनमें से ७० फीसदी मौतें अकेले इजरायल द्वारा गाजा में की गई युद्ध की कार्रवाई के दौरान की गईं। २०२४ में युद्ध क्षेत्र में मारे गए सभी पत्रकारों में से अकेले ८५ पत्रकार गाजापट्टी में मारे गये थे। जबकि इसके पहले २०२३ में कुल १०२ और २०२२ में कुल ६९ पत्रकारों की मौत संघर्ष वाले युद्ध क्षेत्रों में हुई थी। यूनेस्को ने भी २०२४ के अपने आंकड़ों में बताया है कि ६० फीसदी से ज्यादा पत्रकार गाजापट्टी के युद्ध क्षेत्र में मारे गए थे।
हैरानी की बात यह है कि जब ज्यादातर युद्ध ड्रोन या गैर मानव सिपाहियों के बीच लड़े जा रहे हैं, उस दौरान सैनिकों से ज्यादा हताहत होनेवालों में पत्रकारों की संख्या शामिल है। सन २००३ से २०२२ के बीच रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) संस्था के मुताबिक, युद्ध क्षेत्र में कुल १६६८ पत्रकार हताहत हुए थे। इस तरह ८० पत्रकार हर साल संघर्ष के क्षेत्रों में मारे गए। सबसे दयनीय बात यह है कि संघर्ष क्षेत्रों में जान गंवानेवाले ये पत्रकार किसी भी तरफ के नहीं होते। ये तो युद्ध क्षेत्र की हकीकत को बस लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं कि देख लीजिए, इस विकास और वैश्विकता के पक्षधर दुनिया की हकीकत क्या है? ताकि दुनिया को संघर्षों के पीछे मौजूद अहम व हकीकत का पता चले और संघर्षों के खत्म होने के लिए संघर्षरत गुटों या देशों पर नैतिक दबाव बने। लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है कि यहां अपनी जान की बाजी लगाकर बेमतलब के संघर्षों को आईना दिखानेवाले पत्रकारों को ही बेरहमी से निशाना बनाया जा रहा है।
दुनिया का परिदृश्य भयावह रुप से बदल रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक, ऑर्मकनफिलिक लोकेशन एंड इवेंट डाटा प्रोजेक्ट (एसीएलईडी) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में दुनियाभर में सशस्त्र संघर्षों की घटनाएं लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। साल २०२० में जहां ऐसी कुल १,०४,३७१ सशस्त्र घटनाएं दर्ज की गई थीं, वहीं २०२४ में इनकी संख्या बढ़कर पूरे २ लाख हो गई और आशंका है कि इस साल यानी २०२५ में खूनी संघर्ष की इन वारदातों की संख्या बढ़कर ढाई से पौने तीन लाख तक पहुंच सकती है। इन खूनी संघर्षों में इस दौरान विभिन्न सरकारी आंकड़ो के मुताबिक, २,३३,००० लोग मारे गए और १२ करोड़ से ज्यादा लोग इन खूनी संघर्षों के कारण विस्थापित हुए। मध्य-पूर्व, उत्तरी अप्रâीका और पूर्वी यूरोप में संघर्ष सबसे तेज हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजापट्टी में इजरायल-हमास युद्ध और भारत के पड़ोस में स्थित म्यांमार में पिछले दो सालों में सबसे भयावह स्थिति रही है। एसीएलईडी के मुताबिक, साल २०२४ में राजनीतिक हिंसा में २५ फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई और लगभग १/८ लोग इन संघर्षों की वजह से किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए। १/८ का मतलब यह है कि दुनिया की कुल आबादी का ८वां हिस्सा इन संघर्षों के कारण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौरपर प्रभावित रहा।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि जहां इन संघर्षों में सैनिक और आमजन वहीं के मारे गए, जहां ये संघर्ष चल रहे हैं, जबकि इन संघर्षों में मारे जानेवाले पत्रकार पूरी दुनिया के रहे। ऐसे देशों के पत्रकारों ने भी इन खूनी कबीलाई संघर्षों में अपनी जान गंवा दी, जिनके अपने देशों में दूर-दूर तक ऐसा कोई संघर्ष नहीं है। अगर गहराई से सोचें तो इन संघर्षों में अगर वैश्विक समुदाय ने साझे रूप से कहीं अपनी जान गंवाई है तो वह पत्रकारों के समुदाय के रूप में गंवाई है।
हैरानी की बात यह है कि इस सबकी किसी को, किसी तरह की कोई परवाह नहीं है। न किसी प्रभावशाली अंतर्राष्ट्रीय संगठन ही पत्रकारों की बढ़ रही बेतहाशा मौतों से चिंतित है और न ही किसी देश ने, विशेष रूप से इस बात पर कोई ध्यानाकर्षक कदम उठाया है। गाजा युद्ध दुनियाभर के पत्रकारों के लिए पत्रकारिता का दोजख बन चुका है। पत्रकारों के लिए गाजापट्टी का संघर्ष इतिहास का सबसे घातक संघर्ष है। महज तीन सालों के भीतर अभी तक संयुक्त राष्ट्र और कुछ दूसरे स्रोतों के मुताबिक गाजापट्टी में २४२ से २७४ पत्रकार मारे जा चुके हैं और ये सब स्थानीय पत्रकार नहीं थे, बल्कि दुनिया के हर हिस्से से यहां रिपोर्टिंग करने आये पत्रकार थे।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि किसी भी संघर्ष विराम या संघर्ष विराम की कोशिशों में भी पत्रकारों की इन खूनी शहादतों पर कोई एक देश या नेता एक शब्द नहीं कहता। सच बात तो यह है कि पत्रकारों की निर्मम हत्या के प्रति किसी का कोई कंसर्न ही नहीं है। न तो संयुक्त राष्ट्र में इसके लिए कोई प्रस्ताव पास हुआ और न ही कतर से लेकर अमेरिका तक में संघर्ष विराम की अनगिनत कोशिशों में पत्रकारों की इन हत्याओं पर किसी ने कोई दो शब्द कहे। सिर्फ युद्ध क्षेत्र में ही इस दौरान बड़ी संख्या में पत्रकार नहीं मारे जा रहे, बल्कि कई देश भी पत्रकारों के लिए बेहद खतरनाक हो चुके हैं। ऐसे चार सबसे खतरनाक देशों में पाकिस्तान, मैक्सिको, ईराक और म्यांमार शामिल हैं। जहां घोषित तौरपर दो देश नहीं लड़ रहे। महज आंतरिक तनाव और स्थानीय माफियाआें के संघर्ष में भी दर्जनों पत्रकार अपनी जान गंवा रहे हैं।
हैरानी की बात यह भी है कि साल १९९० से २००० के दशक से इस सबकी तुलना करें तो पता चलता है कि अब मीडिया स्टाफ पर भी हमले किए जा रहे हैं। पत्रकारों को मारना, उन्हें प्रताड़ित करना, उनके घरों को बम से उड़ा देना, इस तरह की हरकतें अपराधी संगठनों से लेकर शत्रु देश तक तो पहले से ही करते रहे हैं। अब पत्रकारों के सहायक स्टाफ को भी निशाना बनाया जा रहा है। ड्राइवरों, पत्रकारों के वैâमरामैनों और उनका सामान लेकर चलनेवाले मजदूरों को भी निशाना बनाया जा रहा है। इस तरह देखें तो पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में आज दुनिया बेहद खतरनाक हो गई है।
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)
