मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : रामनगर सीट ... खेल पुराना, नये खिलाड़ी!

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : रामनगर सीट … खेल पुराना, नये खिलाड़ी!

हिमांशु राज
रामनगर विधानसभा सीट, जो बाराबंकी जिले में स्थित है, इस समय भी अत्यंत संवेदनशील और कांटे की टक्कर वाली सीट मानी जा रही है। पिछले कुछ चुनावों में यहां बार-बार जीतने वाला पक्ष बदलता रहा है, जिससे साफ है कि इस क्षेत्र का मतदाता किसी एक दल के स्थायी प्रभाव में नहीं बंधा है। यहां छोटी-सी राजनीतिक चाल, तृतीय मोर्चे की सक्रियता या किसी स्थानीय मुद्दे पर अचानक उभरा जनमत भी परिणाम को उलट सकता है। वर्ष २०२२ के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी फरीद महफूज किदवई ने भाजपा के शरद कुमार अवस्थी को केवल २६१ मतों के बेहद कम अंतर से हराया था। यह जीत इतनी नाजुक थी कि जरा-सी चूक से तस्वीर दूसरी भी हो सकती थी। उस चुनाव में सपा को ४१.९६ प्रतिशत और भाजपा को ४१.८५ प्रतिशत वोट मिले थे, जो बताता है कि दोनों दलों की जमीनी ताकत लगभग बराबर है।
सामाजिक और जातीय समीकरणों की दृष्टि से भी यह सीट बेहद मिश्रित है। मुसलमान, ब्राह्मण, पासी, कुर्मी, यादव और अन्य छोटी जातियों का प्रभाव यहां अलग-अलग इलाकों में दिखाई देता है। सपा को मुस्लिम वोटरों और ग्रामीण एससी वर्ग का बड़ा हिस्सा समर्थन देता रहा है, जबकि भाजपा ब्राह्मण बहुल इलाकों, आंशिक रूप से यादव-कुर्मी मतों और शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करती रही है। २०१७ में भाजपा ने यहां सपा को पराजित किया था, लेकिन २०२२ में सपा ने वापसी कर ली। इससे स्पष्ट है कि जातीय समीकरण यहां पूरी तरह स्थिर नहीं है और एक ही सामाजिक आधार पर सीट सुरक्षित नहीं की जा सकती।
पिछले पांच विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो रामनगर की राजनीति लगातार बदलती रही है। २००२ में सपा, २००७ में कांग्रेस, २०१२ में फिर सपा, २०१७ में भाजपा और २०२२ में दोबारा सपा ने जीत हासिल की। यह सिलसिला बताता है कि यहां मतदाता किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं बंधते, बल्कि हर चुनाव में नए समीकरण और नए मुद्दे निर्णायक बनते हैं। इसी वजह से रामनगर को न तो किसी दल का पक्का गढ़ कहा जा सकता है और न ही किसी को यहां आसान जीत की गारंटी है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रामनगर न तो सपा का सुरक्षित गढ़ है और न ही भाजपा के लिए निश्चित जीत वाली सीट। विधायक निधि का उपयोग, सड़क-नाले की स्थिति, पानी की समस्या, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, रोजगार और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं यहां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों का असर मतदाताओं पर पड़ता है, वहीं भाजपा यदि नए नेतृत्व, जातीय संतुलन और युवा मतदाताओं को साधने में सफल रहती है तो मुकाबला और कड़ा हो सकता है। पिछले नतीजे यह संकेत देते हैं कि अगली जीत भी बहुत कम अंतर से तय हो सकती है, इसलिए स्वतंत्र उम्मीदवारों और छोटे दलों की भूमिका भी अनदेखी नहीं की जा सकती।
कुल मिलाकर, रामनगर सीट राजनीतिक रणनीति, सामाजिक संतुलन और स्थानीय मुद्दों का अनोखा उदाहरण बनी हुई है। यहां जीत के लिए सिर्फ संगठन नहीं, बल्कि सूक्ष्म तालमेल, सतत जनसंपर्क और जमीन से जुड़ी सक्रियता जरूरी होगी।

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