मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : दुर्लभ मृदा और भू-राजनीति...तेल के बाद मिट्टी का खेल

राज की बात : दुर्लभ मृदा और भू-राजनीति…तेल के बाद मिट्टी का खेल

द्विजेंद्र तिवारी, मुंबई

देश में राजनीतिक बहस जारी है कि ट्रंप टैरिफ भारत पर लागू किया गया, चीन पर क्यों नहीं, जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध में चीन खुलकर रूस का साथ दे रहा है। मशविरे दिए जा रहे हैं कि चीन अगर काउंटर टैरिफ से अमेरिका का सामना कर सकता है तो भारत क्यों नहीं। लब्बोलुआब यह कि ट्रंप टैरिफ के इस युद्ध में फिलहाल चीन भारी पड़ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है धरती की पपड़ी में मौजूद वे १७ दुर्लभ खनिज तत्व, जिसके भंडार पर चीन का लगभग एकाधिकार है। चीन ने जैसे ही दुर्लभ खनिज की अमेरिका को आपूर्ति रोकी, डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने अपने कदम वापस खींच लिए। दुर्भाग्य से भारत के पास यह विकल्प नहीं है।
माटी के मोल
इक्कीसवीं सदी में दुनिया की भू-राजनीति अब केवल तेल से संचालित नहीं होती, बल्कि दुनिया में अब मिट्टी का खेल चल रहा है। माटी अनमोल हो गई है और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलिमेंट) एक नए रणनीतिक संसाधन के रूप में उभरे हैं। रेयर अर्थ तत्वों की मांग इस तथ्य के कारण बढ़ रही है कि ये नई तकनीकों के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। स्मार्टफोन, डिजिटल वैâमरा, कंप्यूटर के पुर्जे, सेमी कंडक्टर चिप, नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी, सैन्य मिसाइलें व उपकरण, कांच निर्माण और धातु विज्ञान में इनकी बढ़ती मांग ने आपूर्ति को प्रभावित किया है। इस बात की चिंता बढ़ रही है कि दुनिया को जल्द ही इन दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। धरती मां के आंचल में पैâले इन धूल मिट्टी के कणों में बेशकीमती खनिज छिपे हैं, लेकिन उन्हें प्राप्त करना वैसे ही है जैसे मिट्टी से सोना निकालना। कई टन मिट्टी साफ करके कुछ किलो दुर्लभ खनिज प्राप्त होता है।
चीन का एकाधिकार
चीन इस समय दुर्लभ मृदा खनन के ६० प्रतिशत से अधिक और वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता के ८५ प्रतिशत से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखता है। यह दबदबा उसे एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार प्रदान करता है। चीन ने व्यापार विवादों में दुर्लभ मृदा निर्यात का इस्तेमाल एक मजबूत हथियार के रूप में किया है। वर्ष २०१० में जापान के साथ भड़के विवाद के बाद वर्तमान में ट्रंप टैरिफ के खिलाफ चीन ने इसे सफलता पूर्वक अपनाया है।
इस बाजार पर कब्जा करके चीन ने यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, जापान, भारत और अन्य देशों के उद्योग महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए चीनी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर रहें। इससे दुर्लभ मृदाएं न केवल आर्थिक चिंता का विषय बन जाती हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी बन जाती हैं।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की २०२५ की दुर्लभ मृदा तत्वों पर रिपोर्ट के अनुसार, ४४ मिलियन मीट्रिक टन भंडार के साथ चीन अव्वल स्थान पर है। इसके बाद ब्राजील २१ मिलियन मीट्रिक टन, भारत लगभग सात मिलियन मीट्रिक टन, ऑस्ट्रेलिया साढ़े पांच मिलियन मीट्रिक टन, रूस लगभग चार मिलियन मीट्रिक टन, वियतनाम साढ़े तीन मिलियन मीट्रिक टन और अमेरिका दो मिलियन मीट्रिक टन का स्थान आता है।
वर्ष २०२५ में उत्पादन के मामले में भी २ लाख ७० हजार मीट्रिक टन के साथ चीन अव्वल रहा। इसके बाद अमेरिका में ४५ हजार मीट्रिक टन, म्यांमार में ३१ हजार मीट्रिक टन, ऑस्ट्रेलिया, नाइजीरिया और थाईलैंड में प्रत्येक १३ हजार मीट्रिक टन, भारत में तीन हजार मीट्रिक टन और रूस में ढाई हजार मीट्रिक टन का उत्पादन रहा।
पहचानने में देर
उल्लेखनीय है कि १९४८ तक दुनिया के अधिकांश दुर्लभ मृदा खनिज भारत और ब्राजील के प्लेसर रेत भंडारों से प्राप्त होते थे। उसके बाद भारत पिछड़ता गया।
अमेरिका ने दुर्लभ मृदाओं को रणनीतिक खनिज घोषित किया है और वैâलिफोर्निया तथा टेक्सास जैसे राज्यों में घरेलू खनन और शोधन परियोजनाओं पर काम चल रहा है। यूरोपीय यूनियन ने दुर्लभ मृदा खनिजों को अपनी महत्वपूर्ण कच्चे माल की सूची में शामिल किया है और ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के साथ मिलकर आपूर्ति शृंंखला मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
भारत ने दुर्लभ मृदाओं के भू-राजनीतिक मूल्य को पहचानने में देर कर दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ब्यूरोक्रेसी कभी भविष्य की योजनाओं पर काम नहीं करती। भ्रष्टाचार और आलस्य इसके दो प्रमुख साथी हैं। ऐसे में सेमी कंडक्टर चिप भारत में बनाने की सरकारी घोषणाओं में कितना दम है?

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की २०२५ की दुर्लभ मृदा तत्वों पर रिपोर्ट के अनुसार, ४४ मिलियन मीट्रिक टन भंडार के साथ चीन अव्वल स्थान पर है। इसके बाद ब्राजील २१ मिलियन मीट्रिक टन, भारत लगभग सात मिलियन मीट्रिक टन, ऑस्ट्रेलिया साढ़े पांच मिलियन मीट्रिक टन, रूस लगभग चार मिलियन मीट्रिक टन, वियतनाम साढ़े तीन मिलियन मीट्रिक टन और अमेरिका दो मिलियन मीट्रिक टन का स्थान आता है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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