मुख्यपृष्ठस्तंभरिलेशनशिप ट्रेंड : होबो या होबोसेक्सुअलिटी, डेटिंग के नाम पर जुगाड़!

रिलेशनशिप ट्रेंड : होबो या होबोसेक्सुअलिटी, डेटिंग के नाम पर जुगाड़!

राज ईश्वरी

आमतौर पर माना जाता है कि मोहब्बत की भावुक दुनिया में लेन-देन, नफा-नुकसान यानी मतलब की कोई जगह नहीं होती। कहा जाता है प्यार नि:स्वार्थ होता है, लेकिन बदलते वक्त ने प्यार की परिभाषा बदलकर रख दी है बिल्कुल व्यवसायिक! निश्छल और स्वार्थी नहीं। रिलेशनशिप में जो नए-नए ट्रेंड आ रहे हैं उसमें एक है ‘होबो डेटिंग’ या ‘होबोसेक्सुअलिटी’। यहां पर रिलेशन रिलेशनशिप की नींव ही फायदे के लिए पड़ती है। साफ-साफ शब्दों में कहें तो अपने मतलब के लिए रिलेशनशिप।
ट्रेंड की शुरुआत
दरअसल, यह ट्रेंड अमेरिका और यूरोप से निकला है और इस ‘रोग’ ने अब धीरे-धीरे मुंबई, बंगलुरु, दिल्ली जैसे हिंदुस्थानी शहरों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। सवाल यह है कि यह नया ट्रेंड क्या है और क्या यह आज के रिश्तों की परिभाषा को बदल रहा है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ अहम जानकारियां।
क्या है ‘होबो डेटिंग’?
होबो डेटिंग या होमोसेक्सुअल का मतलब होता है, ऐसा इंसान जो रोमांटिक रिलेशनशिप को घर और सुविधाओं के जुगाड़ के तौर पर इस्तेमाल करता है। इस तरह के रिलेशनशिप में बाहर से सब कुछ नॉर्मल और मोहब्बत में डूबा हुआ दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर एक इंसान पूरे बोझ को उठाता है चाहे वह घर का रेंट हो, सुविधाओं के बिल हों या रोजमर्रा की जिम्मेदारियां।
इंडिया में ट्रेंड बढ़ने की वजह?
रियल एस्टेट रिपोर्ट्स के मुताबिक, बड़े शहरों में पिछले एक साल में मकानों की कीमतों में १०–१४ प्रतिशत तक का उछाल आया है।
मुंबई, दिल्ली या बंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों में १ बीएचके फ्लैट का किराया कई बार ३५,००० से ५०,००० रुपए तक पहुंच जाता है। डिलोइट की रिपोर्ट बताती है कि अकेले रहनेवाले शहरी युवाओं की इनकम का ४०–५० प्रतिशत सिर्फ रेंट में स्वाहा हो जाती है। एक अकेला इस शहर में की तर्ज पर भीड़ में भी कई लोग अकेलेपन से जूझते हैं। जल्दी ‘सेटल’ होने का दबाव लोगों को करीब ले आता है और उसमें जल्दबाजी तो होती ही है।
होबो डेटिंग का असर
एक पार्टनर लगातार खर्च उठाता है, जिससे उसकी सेविंग और स्थिरता प्रभावित होती है। जब जिम्मेदारियां बराबर न हों तो रिश्ते में थकान और नाराजगी बढ़ने लगती है और रिश्ता बोझ बन जाता है। लेकिन इस वन-वे ट्रैफिक का असर दूसरे पार्टनर पर भी पड़ता है। क्योंकि जो पार्टनर घर या पैसा देता है वह हावी होता चला जाता है, डिसीजन मेकर के तौर पर वह अपनी मनमानी पर उतर आता है। और दूसरे के पास भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह जाता।
बॉक्स अगर जरूरी पड़े
‘होबो डेटिंग’ या होबोसेक्सुअलिटी, ऐसे रिश्तों का वर्णन करती है, जहां एक साथी भावनात्मक संबंध के बजाय मुख्य रूप से आवास या वित्तीय सहायता चाहता है, अक्सर वास्तविक स्नेह की आड़ में। यह शब्द ‘होबो’ (गृहहीनता, बेघर या अस्थिरता को संदर्भित करता है) और ‘लैंगिकता’ को जोड़ता है। यह प्रवृत्ति शहरी क्षेत्रों में देखी जाती है, जहां जीवन-यापन की उच्च लागत के कारण लोग आवास या उच्चतर जीवन स्तर प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक तरीके के रूप में संबंधों का उपयोग करते हैं।

कैसे पहचानें होबो डेटिंग?
पार्टनर का फाइनेंसियल सपोर्ट बहुत कम या न के बराबर हो। घर का रेंट, बिल या एक्सपेंस में भागीदारी न दिखे। यदि उसकी दिलचस्पी आपकी प्रॉपर्टी या फाइनेंसियल स्टेटस में ज्यादा हो, बजाय आपके हर मामले में। यदि आप महसूस कर रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर इमोशनल सपोर्ट नहीं मिल रहा है। शुरुआत में बहुत ध्यान देने वाला/वाली एक-एक वक्त बीत जाने के बाद जिम्मेदारियों से बचने लगा/लगी है।

आखिर क्या है सोल्यूशन?
रिलेशनशिप की शुरुआत वैâसे कब का होगी, इसका अंदाजा नहीं होता है। लेकिन अगर रिश्ते बन ही गए हैं तो रिलेशनशिप की शुरुआत में ही आर्थिक और घरेलू जिम्मेदारियों पर साफ बात करें। रिलेशनशिप तभी स्वस्थ रहेगा, जब दोनों पार्टनर बराबर योगदान देंगे। अगर रिलेशनशिप में एकतरफा महसूस होने लगे तो सीमाएं तय करना जरूरी है। आर्थिक और भावनात्मक मजबूती रिश्तों में समझौते की मजबूरी कम करती है। आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल में भले ही नए-नए बदलाव आ रहे हैं तो ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आप रिलेशनशिप को लेकर चल रहे नए ट्रेंड के बारे में अपने आप को अपडेट रखें और कोशिश करें इस तरह के रिलेशनशिप शिकार तो नहीं हो रहे, क्योंकि एक बार रिलेशनशिप में बंध जाने के बाद उससे निकलना आसान नहीं होता यदि आप ज्यादा इमोशनल हैं, ईमानदार हैं और मोहब्बत की कदर करते हैं।

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