मुख्यपृष्ठधर्म विशेष`ॐ पितराय नमः’ से करें पितरों का स्मरण

`ॐ पितराय नमः’ से करें पितरों का स्मरण

-सूर्य को अर्घ्य देने के बाद 21 बार मंत्र-जाप की परंपरा; कम समय में की जा सकती है सरल पितृ पूजा

शीतल अवस्थी

धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में पितृदोष को मानसिक अशांति, आर्थिक परेशानी तथा पारिवारिक बाधाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसके निवारण के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान का विधान है। समय अथवा साधनों के अभाव में श्रद्धालु *‘ॐ पितराय नमः’* मंत्र के माध्यम से भी अपने पूर्वजों का स्मरण कर सकते हैं।

यह छोटी और सरल उपासना पितृपक्ष के किसी भी दिन की जा सकती है। रविवार, अमावस्या अथवा संबंधित पूर्वज की श्राद्ध तिथि पर इसे विशेष रूप से करने की परंपरा मिलती है।

पूजा की सरल विधि

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तांबे के लोटे में स्वच्छ जल भरें। उपलब्ध हो तो उसमें सफेद आक का पुष्प डालें। उगते सूर्य की ओर मुख करके धीरे-धीरे अर्घ्य दें और 21 बार बोलें—

*ॐ सूर्याय नमः॥*

सीधे सूर्य को लगातार न देखें। जल अर्पित करते समय मन में सूर्यदेव से परिवार और पूर्वजों के कल्याण की प्रार्थना करें।

इसके बाद घर के पूजा-स्थान पर दीपक और धूप जलाएं। पितरों की तस्वीर रखने की पारिवारिक परंपरा हो तो उसे साफ स्थान पर रखें। तस्वीर उपलब्ध न हो तो भगवान विष्णु के सामने अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का स्मरण करें।

चंदन अथवा रुद्राक्ष की माला से 21 या 108 बार जाप करें—

ॐ पितराय नमः॥

संकल्प और प्रार्थना

मंत्र-जाप से पहले संबंधित पूर्वज का नाम और गोत्र बोल सकते हैं। जानकारी न हो तो कहें—

“मैं अपने कुल के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं। मेरे द्वारा किया गया यह जाप स्वीकार करें और परिवार को सद्बुद्धि एवं सुख-शांति प्रदान करें।”

जाप पूरा होने के बाद पितरों से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें। संभव हो तो गाय को रोटी, कौए को अन्न और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन दें।

इन बातों का रखें ध्यान

* मंत्र का उच्चारण शांत और स्पष्ट रूप से करें।
* पूजा भय या चमत्कार की अपेक्षा से नहीं, कृतज्ञता के भाव से करें।
* माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों की सेवा को प्राथमिकता दें।
* गंभीर आर्थिक, स्वास्थ्य या पारिवारिक समस्या को केवल पितृदोष न मानें; उसका व्यावहारिक समाधान भी तलाशें।

‘ॐ पितराय नमः’ मंत्र का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का भाव जागृत करना है। सच्ची पितृभक्ति का श्रेष्ठ रूप उनके अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना और जीवित बुजुर्गों की सेवा करना है।

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