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वियतनाम में योग सिखाकर  परिवार की जीविका चला रहे झारखंड के दो युवाओं की सड़क दुघर्टना में मौत…शव लाने में गरीबी बनी फजीहत

अनिल मिश्र / रांची

झारखंड प्रदेश के दो युवा अपने लिए बेहतर रोजगार की तलाश में वियतनाम गए थे। इस बीच इन दोनों वहां योग सिखाकर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन 25 सितंबर को हुए सड़क हादसे ने दोनों परिवारों की उम्मीदों को गहरे दुख में बदल दिया है। इस हादसे में राजधानी रांची के चौबीस वर्षीय राजा कुमार की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि लौह नगरी जमशेदपुर के तेईस वर्षीय विनय ने दो दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया। अब दोनों के परिवार उनके शव भारत लाने की कोशिश में जुटे हैं। आपको जानकारी दे दें कि वियतनाम के सबसे चर्चित पर्यटन स्थल में शुमार दा-लाट शहर में 25 सितंबर की शाम एक सड़क दुर्घटना ने रांची और जमशेदपुर के दो परिवारों की खुशियां छीन लिया । दरअसल हादसे के दिन ही रांची के राजा कुमार वर्मा का घटनास्थल पर ही निधन हो गया, जबकि घायल जमशेदपुर के विनय यादव ने 27 सितंबर को अस्पताल में दम तोड़ दिया. अब दोनों परिवार अपने लाडलों के पार्थिव शरीर का इंतजार कर रहा है।डेड बॉडी को वियतनाम से लाने पर दस लाख से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है, जो दोनों गरीब परिवारों के पास नहीं है।इस संबंध में दिवंगत राजा के पिता उमेश कुमार वर्मा बेटा के निधन से टूट गए हैं। उसके बारे में बात करते हुए फफक पड़ते हैं। सिसकते हुए उन्होंने कहा कि ढाई माह पहले राजा घर आया था। कह कर गया था कि पापा सब कुछ ठीक कर देंगे। राजा के मेमेरे भाई संजय कुमार वर्मा ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। राजा बहुत समझदार था।किसी तरह मैट्रिक तक की पढ़ाई कर पाया था।बहुत मेहनत करके वियतनाम के एडीआई योगा एकेडमी में योग टीचर बना था। वहीं राजा कुमार वर्मा के चचेरे भाई अमित ने बताया कि राजा के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी। उसने सरकारी स्कूल से मैट्रिक पास किया था। बड़ी ही मुश्किल से योग की ट्रेनिंग ली और वियतनाम में काम कर रहे अपने मामा के सहयोग से वहां योगा टीचर की नौकरी हासिल कर ली थी। राजा के पिता उमेश कुमार वर्मा बिजली मिस्त्री हैं।प्लंबर का भी काम कर लेते हैं। राजा का एक छोटा भाई शुभम सोनी है, जो बेरोजगार है। छोटी बहन स्कूल में पढ़ाई कर रही है। परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि टूट चुके एसबेस्टस की छत को बदल सके। राजा को जब वियतनाम में नौकरी मिली थी तो उम्मीद जगी थी। राजा ने अपने पिता से कहा था कि बहुत जल्द पैसे जमा कर घर को दुरुस्त करा लेंगे। हर महीने अपने पिता को घर चलाने के लिए कुछ पैसे भी भेजता था। हाल ही में रांची आया था, लेकिन किसी को नहीं मालूम था कि अब उसके पार्थिव शरीर का इंतजार करना पड़ेगा।

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