जय सिंह
पुलिस मुख्यालय के आहते में पहुंचते हुए एक अधिकारी की बात कान में पड़ी, वो कह रहा था सायबर क्राइम की ‘रिकवरी १,००० करोड़ पार।’
कागजों पर यह सुनने में उपलब्धि लगती है, लेकिन मेरे भीतर एक सवाल फौरन उठा। क्या वाकई सिस्टम जीत रहा है या हम सिर्फ आंकड़ों की चमक में सच्चाई ढक रहे हैं? दिनभर की दौड़भाग, लेकिन तस्वीर अभी भी धुंधली कई महीनों से अपराध पर रिपोर्टिंग करते-करते कभी-कभी सायबर क्राइम की ओर मूड़ जाता हूं, वही चेहरे, वही शिकायतें और वही टूटे हुए भरोसे देख रहा हूं।
लाखों रुपए हर रोज गायब- और ज्यादातर लोग तो शिकायत तक नहीं कर पाते। ऐसे में १,००० करोड़ की रिकवरी का दावा सुनकर पहला सवाल यही था। बाकी कितना अभी भी सिस्टम की उंगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल गया? सायबर के लिए बने १९३० नंबर से बहुत मदद मिलती है। कॉल आते ही हम खाते प्रâीज कर देते हैं।’
लेकिन मैंने देखा, ‘फोन लगातार बजते रहे, पर कई कॉल बिना जवाब के नहीं होता। स्टाफ कम, शिकायतें ज्यादा।
कई लोग घंटों लाइन में फंसे रहते हैं, तब तक उनके पैसे ४–५ खातों से घूमकर गायब हो चुके होते हैं।
तो क्या यह हेल्पलाइन सच में ‘उम्मीद’ है या ‘दिखावा’?
‘म्यूल एकाउंट’: टूट रही कड़ी या छुपा हुआ जंगल?
कंट्रोल रूम की स्क्रीन पर लाल लाइनों का जाल किसी नक्शे से ज्यादा एक चेतावनी जैसा दिखता था।
अधिकारी ने बताया, ‘म्यूल एकाउंट पकड़ लेते हैं तो चेन टूट जाती है।’
पर सच्चाई यह थी कि एक चेन टूटती है तो १० नई बन जाती हैं। पकड़े गए खाताधारक अधिकतर गरीब, अनजान या लालच में आए लोग होते हैं।
मगर असली मास्टरमाइंड?
वह सिस्टम के बाहर-पहुंच से दूर।
शाम की ‘उपलब्धि’: १,००० करोड़ या १,००० सवाल।
शाम होते-होते खबर आ गई कि कुल रिकवरी १,००० करोड़ पार कर गई।
कंट्रोल रूम में हल्की मुस्कराहटें थीं, लेकिन उनमें एक अजीब-सी थकान भी छुपी थी, जैसे सभी जानते हों कि यह ‘उपलब्धि’ उस नुकसान की तुलना में बहुत छोटी है, जो लगातार बढ़ रहा है।
किसी अधिकारी ने यह नहीं कहा, पर महसूस होता रहा।
‘हम जीत नहीं रहे… बस पीछे नहीं छूटना चाह रहे हैं।’
डायरी के इस पन्ने पर कुछ कड़े सवाल
आम लोग आज भी हर फोन कॉल, एश्ए और लिंक को लेकर अनजान क्यों?
बैंकिंग सिस्टम में कमजोरियां कब तक ‘अपडेट आनेवाला है’ के पीछे छुपती रहेंगी?
१९३० नंबर छोटे कस्बों में कब बर्फ की तरह पिघलनेवाला भरोसा बनेगा, न कि सिर्फ महानगरों की सुविधा?
सबसे बड़ा सवाल: क्या रिकवरी की कहानी उतनी चमकदार है, जितना हमें दिखाया जा रहा है?
मैं यह पन्ना बंद करता हूं, लेकिन मन में एक ही बात गूंजती है-
साइबर अपराधी आगे हैं, सिस्टम पीछे।
और यह ‘सबसे बड़ी वापसी’ शायद हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी भी हो सकती है। इसका तोड़ हम खोजते जरूर है, लेकिन जब तक हम उस मुकाम पर पहुंचते है तब तक सायबर क्राइम करने वाला नेटवर्क उससे कई गुना आगे बढ़ जाता है।
