आदित्य जैन
रात के ११ बजकर ५५ मिनट का वक्त।
ठाणे की पाचपाखाड़ी की यह गली आमतौर पर इस समय तक थककर सो चुकी होती है, लेकिन कई महीनों से शहर की नींद किसी अदृश्य हाथ ने जैसे रोक रखी है। आज भी वही हुआ, पहले एक तेज धमाका, फिर दूसरा और फिर डीजे की गर्जना जिसने गली की खिड़कियों, दीवारों और लोगों की नसों में घुसकर सबकुछ हिला दिया।
कुछ बाइकें अचानक घुसती हैं। उनके एग्जॉस्ट की दहाड़ें ऐसा लगता है, जैसे रात की छाती चीर रही हों। लड़के हेलमेट पटकते हैं, कार की बोनट पर जल्दीबाजी में सजाया गया केक रखा जाता है और मोबाइल की फ्लैश लाइटें ऑन होते ही गली एकदम अलग दुनिया में बदल जाती है- चीखें, नारे, उछलते साए, चेन-फटाकों की तेज कड़क और कानों को चीर देनेवाला शोर।
इसी शोर के बीच चौथी मंजिल की एक खिड़की धीरे से खुलती है। अंदर से कांपती आवाज में एक बुजुर्ग महिला कहती हैं…
बेटा… मेरा बीपी बढ़ जाता है… ये कब बंद होगा?
उनकी आवाज में सिर्फ डर नहीं था, बल्कि ऐसी थकान थी जो हर रात थोड़ी-थोड़ी मौत की तरह लौटती है। यह सिर्फ ध्वनि प्रदूषण नहीं, यह उन बुजुर्गों की सेहत, बच्चों की नींद और हर घर की मानसिक शांति पर हमला है।
निवासी कंट्रोल रूम में फोन करते हैं। उधर से वही रटा-रटाया जवाब, टीम भेज रहे हैं।
कुछ मिनट बाद पुलिस की सायरन वाली गाड़ी गली में मोड़ लेती है, लेकिन तब तक सब खत्म।
वो १५–२० लड़कों की टोली पलभर में गायब हो चुकी होती है।
पीछे सिर्फ जली बारूद की गंध, टूटे पटाखों का मलबा और पुलिस की मजबूरी हवा में तैरती रह जाती है। एक अधिकारी धीमे से कहते हैं टाइमिंग पकड़ लेते हैं… हाथ नहीं आते।
दिन में किसी दादा की हलदी निकलती है, रात में किसी भाई का बर्थडे।
गली बंद, मंडप खड़े और कान फाड़नेवाला साउंड।
कानून, कोर्ट का आदेश, डेसिबल लिमिट—सब फाइलों में ठीक है, सड़क पर इनका कोई मतलब नहीं।
इन लड़कों के लिए नियम सिर्फ मीम हैं… और सोशल मीडिया इस उन्माद का असली ईंधन।
बाइक का शोर, गाली-गलौज, सड़क पर केक मसलना, पटाखों की चेन। सबका मकसद एक ही, भाई की बर्थडे नाइट इंस्टा पर वायरल होनी चाहिए।
इन सबके बीच एक पल ऐसा था, जो दिल में कील की तरह अटक गया। एक दो साल का बच्चा रात के एक बजे लगातार रो रहा था।
उसके पिता ने कहा
कहां जाएं? मां बुज़ुर्ग है… बच्चा है… रातें नहीं कटतीं।
उनके चेहरे पर सिर्फ थकान नहीं थी, एक नागरिक का टूटा हुआ भरोसा दिख रहा था।
इलाके के कुछ लोग बताते हैं कि कुछ नेता खुद इन टोलों तक पहुंचकर बर्थडे विश करते हैं।
क्योंकि यह शोर जहां जनता के लिए दहशत है, वहीं उनके लिए सीधा वोट बैंक। ठाणे की रातें अब सोती नहीं हैं। वे जागती हैं—डर, बेबसी और कानफाड़ू शोर के बीच।
और शहर?
शहर सो नहीं रहा…
शहर डर के साथ जाग रहा है।
