सुरेश मिश्र
गांव से मुंबई आने पर नायिका ने बड़े-बड़े सपने देखे थे कि जुहू चौपाटी देखूंगी, गेट ऑफ इंडिया जाऊंगी, मुंबई की रामलीला देखूंगी। मगर मुंबई आने के बाद उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए। घर के ताम-झाम में कुछ इस कदर फंसी कि न कहीं घूमना हुआ और न फिरना। पतिदेव से कुछ कहती तो वो छुट्टी न मिलने का बहाना बना देते। खैर, पतिदेव की रोज-रोज बहानेबाजी से तंग आकर एक दिन उसने जिद पकड़ लिया कि मुझे रामलीला दिखाइए वरना गांव छोड़ आइए। उसने कहा-
पिया चलिके रामलिलवा देखाइ द
मंसा पुराइ द न।
दुनहू हाथ तोहसी जोरी,
केतनी करइब्या चिरौरी,
गौरी से कहेन कऽ शिव, हमइ बताइ द
मंसा पुराइ द न।
बोरीवली-कॉटन ग्रीन,
भक्त देखइं होइ तल्लीन,
कवन पाप कीन हम, तनी समुझाइ द
मंसा पुराइ द न।
नई मुंबई क लीला,
भालू-बानर लाल-पीला,
अपने दिल म सोए राम के जगाइ द
मंसा पुराइ द न।
कइसे राम धनुष तोरिहैं,
सीता जी से नाता जोरिहैं,
छोड़िहैं राजमहल काहें क समुझाइ द
मंसा पुराइ द न।
तोहरा कवनउ न ठेकाना,
लइके बरखा के बहाना,
बार-बार हमइ बुड़बक जिनि बनाइ द
मंसा पुराइ द न।
तू दशहरा तक बितइल्या,
हमके मेलवा न देखइल्या,
मन म राग-द्वेष हउवे तउ जराइ द
मंसा पुराइ द न।
सुना-सुना हे सुरेश,
काहें फाने हउवा क्लेश,
तू कमा इहीं पे हमके घर पहुंचाइ द
मंसा पुराइ द न।
