मुख्यपृष्ठस्तंभरौबीलो राजस्थान : पुरस्कार, पोथ्यां अर चतर लेखक

रौबीलो राजस्थान : पुरस्कार, पोथ्यां अर चतर लेखक

बुलाकी शर्मा, राजस्थान

आं बरसां थोक में पुरस्कार दिरीज रैया है। चावै जिको ई आपरै सुरगवासी बडेरां रै नांव पुरस्कार देवणो सरू कर देवै अर म्हारै जिसा ‘स्वाभिमानी लिखारा’ पुरस्कार कबाड़ण सारू ताफड़ा तोड़ण लागै।
पुरखां रै नांव सूं पुरस्कार सरू करणिया म्हां जिसा लेखकां सूं डोढ़ हुस्यार हुवै। बै जाणै वैâ बां री याद मांय अखबारां में विज्ञापन छपायां खरचो घणो पड़ै। विज्ञापन अ‍ेकर छपै, पुरस्कार री खबरां लगोलग फोकट में छपती रैवै। नपैâ-नुकसान रो तलपट मिलायनै ई पुरस्कार सरू करै।
पुरस्कार इक्कीस रुपियां रो हुवै कै इक्कीस सौ वैâ इक्कीस हजार रो, म्हैं अ‍ेप्लाई कर दिया करूं। अ‍ेक सेठ रै बडैरां री याद में २१ हजार रै अ‍ेक पुरस्कार सूं म्हैं लारलै दिनां सनमानित‌ हुयो हूं। चतराई ‌सूं पुरस्कार कबाड़ीज्या करै। पोथी रै भरोसै रैवणिया भोळा हुवै।
पुरस्कार सारू अरजी लगाय’र गुप्ताऊ तरीकै सूं आ खोज करी वैâ किसा-किसा लेखक लंगोट पैरियोड़ा म्हनैं पछाड़ण सारू अखाड़ै में है। फेर पुरस्कार‌ देवणियै सेठ री सांतरी कोठी पूग्यो। सांतरी कोठीआळा ई सांतरै तरीके सूं आपरै बडैरां री याद में खरचो कर सवैâ, गरीब-गुरबा ल्याई सराधां में ई याद करै।
सेठजी नै गंभीरता सूं कैयो, ‘म्हैं आपनै आ अरज करण नै आयो हूं वैâ पूजनीक दादोसा रै नांव रै पुरस्कार सूं म्हनैं मुगत राख्या।’
बे चिमक्या। बोल्या, ‘ओ कांई कैय रैया हो कविराज?’
‘जिका लेखकां नै आप मान-सनमान देवो, बै आपरै देवलोकवासी दादोसा सारू इत्ता भूंडा बोल बोल रैया है कै बता नीं सकूं। आपरै दादोसा री जोड़ रो सेवाभावी, भामाशाह, धर्मात्मा आपांरै स्हैर ई नीं, आखै राज्य में कोनी हुयो। पण बे बां देवपुरुस नै मिलावटियो, सूदखोर, शोषक… म्हैं बता नीं सकूं सेठां!’
जिद करनै बां पूरी बात जाणनी चाई। म्हैं म्हारी योजना मुजब म्हारै साम्हीं पुरस्कार सारू अखाड़ै उतरियोड़ा लेखक-कवियां रा नांव सिरकाय’र होळै-सीक वैâयो, ‘म्हारै मन में खुद रै दादै सूं बेसी आव-आदर आपरा दादोसा रो है जणैई…!’
म्हारी बात बिचाळै काटता बै रीस में बोल्या, ‘म्हारै कनै आय’र पुरस्कार सारू अ‍े सगळा हाथा-जोड़ी करता रैवै अर लारै सूं भूंडी बातां करै… नालायक कठैई रा…।’
पैâरूं पैâसलो ई सुणाय दियो, ‘म्हारै दादोसा री याद रो पुरस्कार आपनै देसूं कविराज… आप जिसै खरै लेखक नै पुरस्कार दियां ई म्हारै दादोसा री आतमा नै आनंद मिलसी।’
जाणग्या नीं वैâ पुरस्कार चतराई सूं ई मिल्या करै।

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