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रोखठोक : मराठी एकता की जीत हो!

संजय राऊत

केंद्र सरकार के हिंदी सख्ती कानून से महाराष्ट्र के लिए एकमात्र महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मराठी अस्मिता के लिए सभी मराठी माणुस एकजुट हो गए और मराठी लोगों की जिद के कारण ठाकरे बंधु उद्धव और राज एक साथ एक मंच पर आ गए। फडणवीस सरकार को महाराष्ट्र में हिंदी अनिवार्यता आदेश को रद्द करना पड़ा। इसके कारण ५ जुलाई को मोर्चे का रुपांतर मराठी विजय दिवस में हो गया। दोनों ठाकरे भाइयों की मौजूदगी में एक शानदार विजय समारोह संपन्न हुआ। यह तस्वीर महाराष्ट्र और मराठी लोगों के भविष्य के लिए आशादायी है। हिंदी भाषा की अनिवार्यता के खिलाफ महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में ‘भाषा युद्ध’ छिड़ गया। दक्षिणी राज्य तो ‘करो या मरो’ के आक्रोश में हिंदी के खिलाफ खड़े हो गए। महाराष्ट्र ने विरोध शुरू कर दिया, लेकिन इस मुद्दे पर ‘ठाकरे’ एक साथ आकर मराठी लोगों का नेतृत्व कर रहे हैं, इस खबर के कारण ही सरकार पीछे हट गई, यह महत्वपूर्ण है।
राक्षसी महत्वाकांक्षा
मराठी माणुस एकजुट हो जाएं और उनका नेतृत्व ‘ठाकरे’ करें तो क्या हो सकता है, यह इस दौरान दिखाई दिया। भारतीय जनता पार्टी की राक्षसी महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए उद्धव और राज को एक साथ आना चाहिए। अगर वे एक साथ नहीं आए तो महाराष्ट्र को बहुत बड़ा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी, ऐसी भावना बढ़ती गई। नारायण राणे, एकनाथ शिंदे और भाजपा के ‘दलबदलू’ ठाकरे के एक साथ आने का मजाक उड़ाते रहे, लेकिन एकनाथ शिंदे जैसे लोगों ने भाजपा की चाटुकारिता नीति को स्वीकार कर मराठी लोगों की एकता को तोड़ दिया। भाजपा के दिल्ली के नेताओं के मुंबई में आर्थिक हितों की रक्षा के लिए भाजपा ने ‘शिवसेना’ को तोड़ दिया। मराठी लोगों को आपस में लड़ाने का उद्योग शुरू कर दिया। इसमें बड़े पैमाने पर पैसे का खेल चल रहा है। पिछले कुछ दिनों में मराठी लोगों का गला कैसे घोंटा जा रहा है, यह देखिए –
अमित शाह, नरेंद्र मोदी महाराष्ट्रद्वेषी हैं। संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई के कारण मुंबई गुजरात को नहीं मिलीr, इसको लेकर उनके मन में कड़वाहट है। अपने शासनकाल में ‘मुंबई’ को गुजरात का गुलाम बनाएंगे, ये उनकी नीति है।
छत्रपति शिवराय ने ‘अंग्रेजों’ को रंगदारी देनेवाले सूरत के व्यापारी वर्ग पर हमला करके इस अंग्रेज-प्रेमी व्यापारी वर्ग को लूट लिया। इसके बदले में मुंबई को लूटना और शिवराय के महाराष्ट्र से बदला लेना ही मोदी-शाह की आंतरिक नीति है।
महाराष्ट्र का गौरव माने जाने वाले सभी सरकारी कार्यालय मुंबई से गुजरात स्थानांतरित कर दिए गए हैं। इनमें डायमंड बाजार, एयर इंडिया आदि शामिल हैं।
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन अहमदाबाद के अमीर व्यापारियों की सुविधा के लिए है। मुंबई-दिल्ली, मुंबई-इंदौर के लिए भी बुलेट ट्रेनें बनाई जा सकती थीं, लेकिन मुंबई को सीधे गुजरात से जोड़ा गया और इसके लिए पालघर, डहाणू, ठाणे जिलों के किसानों की जमीनें जबरन ली गर्इं। मुंबई के ‘बीकेसी’ में जमीन का एक महत्वपूर्ण भूखंड भी बुलेट ट्रेन के नाम पर लूट लिया गया।
वित्तीय प्रावधानों की कमी के कारण मुंबई में मराठी स्कूल और मराठी पुस्तकालय बंद हो रहे हैं।
मराठी लोगों की संस्थाओं और संगठनों का व्यवस्थित विघटन शुरू हो गया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एहसास हुआ कि घाटकोपर जैसे क्षेत्र की भाषा ‘मराठी’ नहीं, बल्कि गुजराती है और उन्होंने इसे मुखर किया है।
मराठी पर जोर देने वालों के खिलाफ मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
पिछले दस सालों में महाराष्ट्र में एक भी बड़ा उद्योग नहीं आया। जो लोग उत्तर महाराष्ट्र में निवेश करना चाहते थे, वे बाहर चले गए। मुंबई में अब कोई महत्वपूर्ण उद्योग नहीं बचा है। आड़ी मुंबई को खड़ी करना अर्थात एक निर्माण व्यवसाय ही बचा है, इसलिए मुंबई के सभी रणनीतिक भूखंड अमराठी लोगों के हाथों में दे दिए गए। लोढ़ा और अडानी के नाम पर टॉवर्स बनाए जा रहे हैं। बांद्रा के मौके की जगह, म्हाडा की इमारत पर मुंबई के बड़े बिल्डर और उद्योगपतियों की नजरें हैं। म्हाडा कार्यालय को स्थानांतरित कर वहां एक वाणिज्यिक संकुल बनाने की चालें धक्कादायक हैं। इसी तरह एक दिन हुतात्मा चौक की जमीन भी बाहर के बिल्डर और उद्योगपति ले लेंगे।
धारावी पुनर्वास के नाम पर मोदी, शाह और फडणवीस ने गौतम अडानी को मुंबई को लूटने का खुला लाइसेंस दे दिया। बांद्रा रिक्लेमेशन, कुर्ला की मदर्स डेयरी, दहिसर टोलनाका, मुलुंड टोलनाका और मीठागर की रणनीतिक जमीनें अडानी को दे दी गर्इं। धारावी विकास का काम म्हाडा मराठी बिल्डरों की मदद से आसानी से कर सकता था, लेकिन मुंबई का सातबारा अडानी के नाम पर करने का प्रयास फडणवीस किए जा रहे हैं।
मुंबई और उपनगरों में बिजली वितरण और उसके बिल वसूलने का ठेका गुजरात के ठेकेदारों को दिया गया है।
नासिक-त्र्यंबकेश्वर में होने वाले कुंभ मेले के लिए सरकार ने २०,००० करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। कुंभ मेले के सभी बड़े ‘ठेके’ गुजरात के ठेकेदारों को ही मिल रहे हैं। यह सब महाराष्ट्र और मराठी माणुस के साथ अन्याय है। मोदी, शाह और फडणवीस के दौर में मराठी माणुस सत्ताधारियों का जैसे गुलाम हो गया है। वह खुद के तेज और शौर्य को भूल गया है। पहली बार मालवण में शिवराय की मूर्ति गिरी। दूसरी बार मूर्ति के नीचे की जमीन धंस गई। फिर भी मराठी माणुस चुप रहा। वह हिंदी की सख्ती पर भड़क उठा और ‘ठाकरे’ एक साथ आ रहे हैं, इस भरोसे पर लड़ने के लिए तैयार हो गया!
मार्ग भिन्न, फिर भी…
राजनीति में उद्धव और राज ठाकरे के मार्ग भिन्न और दोधारी हो गए। शाह द्वारा किए गए विभाजन के बाद शिवसेना कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ महाविकास अघाड़ी में शामिल हो गई। राज ठाकरे भाजपा, शिंदे गुट आदि के साथ प्रेम का चाय-पान करते रहे। अमित शाह से मिलने के लिए वे दिल्ली भी जाकर आए, लेकिन इससे महाराष्ट्र को कोई लाभ नहीं हुआ और मनसे की राजनीतिक राह भी आगे नहीं बढ़ पाई। मराठी लोगों और ठाकरे बंधुओं के बीच फूट डालने में ही दिल्ली और यहां की व्यापारिक राजनीति का हित है। मतदाता सूची में लाखों प्रवासियों के नाम घुसाकर भाजपा और उसके मित्रपक्ष चुनाव जीत रहे हैं। इसमें मनसे की भी हार हुई। मराठी वोट प्रतिशत बढ़ाना। इससे सभी महापालिका, जिला परिषद और विधानसभा चुनावों में एकजुटता का आह्वान करने में ही महाराष्ट्र का हित है। विजयी उत्सव की परंपरा के पटरी पर आने पर ही मराठी लोग स्वाभिमान से जी पाएंगे। नहीं तो ढोल-नगाड़े बजेंगे, गर्जना उठेंगी, बिगुल फुंके जाएंगे। यह उत्साह ऐसे ही बना रहना चाहिए!
‘मराठी एकता की जीत हो!’ अभी के लिए बस इतना ही करें!

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