मुख्यपृष्ठनए समाचारआरटीओ बना ‘रेवेन्यू ऑफिस’...सड़क सुरक्षा भगवान भरोसे!

आरटीओ बना ‘रेवेन्यू ऑफिस’…सड़क सुरक्षा भगवान भरोसे!

-मुंबई, ठाणे में बढ़ते हादसों के बीच विभाग की भूमिका पर उठे सवाल

सुनील ओसवाल / मुंबई

महाराष्ट्र में सड़क हादसों का ग्राफ लगातार चिंता बढ़ा रहा है, लेकिन परिवहन विभाग और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) की प्राथमिकताएं क्या हैं, इस पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। वाहन चालकों का आरोप है कि आरटीओ का पूरा तंत्र अब सड़क सुरक्षा से ज्यादा चालान, जुर्माना और राजस्व वसूली पर केंद्रित दिखाई देता है। सड़क सुरक्षा के नाम पर अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए आरटीओ की सक्रियता शायद ही कहीं दिखाई देती है।
मुंबई, ठाणे, पालघर, पुणे और नासिक जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में हर दिन लाखों वाहन सड़कों पर उतरते हैं। इसके बावजूद दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान, सड़क सुरक्षा ऑडिट, ब्लैक स्पॉट सुधार और तकनीकी अध्ययन जैसे विषय आरटीओ की प्राथमिकताओं में नजर नहीं आते। विभाग की अधिकांश ऊर्जा ई-चालान, परमिट, फिटनेस, टैक्स वसूली और प्रवर्तन कार्रवाई में खर्च होती दिखाई देती है।
आलोचकों का कहना है कि आरटीओ कार्यालयों का मूल उद्देश्य केवल वाहन पंजीकरण और राजस्व संग्रह नहीं, बल्कि सुरक्षित यातायात व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि सड़क हादसे होने के बाद रिपोर्ट तैयार होती है, बैठकें होती हैं और निर्देश जारी किए जाते हैं, जबकि हादसों को रोकने के लिए आवश्यक पूर्व तैयारी और निगरानी तंत्र कमजोर बना हुआ है।
राज्यभर में वाहन चालकों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि आरटीओ की मौजूदगी सड़क पर केवल जांच नाकों और चालान कार्रवाई तक सीमित होकर रह गई है। सड़क सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन हादसों की संख्या कम करने के ठोस परिणाम दिखाई नहीं देते।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरटीओ कार्यालयों के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल राजस्व वसूली से होगा या सड़क हादसों में कमी लाने की क्षमता से भी? यदि किसी जिले में दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, तो उसकी जवाबदेही तय करने का कोई तंत्र क्यों नहीं है?
वसूली के बजाय सुविधा पर हो ध्यान
महाराष्ट्र की सड़कों पर हर साल हजारों परिवार हादसों की त्रासदी झेलते हैं। ऐसे में अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि आरटीओ को केवल ‘वसूली विभाग’ के बजाय वास्तविक सड़क सुरक्षा विभाग के रूप में काम करना होगा। अन्यथा चालान बढ़ते रहेंगे और हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या भी।

अन्य समाचार