मुख्यपृष्ठस्तंभग्रामीण विकास, बजट और जिम्मेदारी: भरतकुमार सोलंकी, वित्त विशेषज्ञ

ग्रामीण विकास, बजट और जिम्मेदारी: भरतकुमार सोलंकी, वित्त विशेषज्ञ

गांव का विकास आखिर रुकता क्यों है? क्या वजह हैं कि वर्षों से वही समस्याएं—टूटी सड़कें, गंदगी, बदहाल नालियां, अधूरी रोशनी—जैसे गांव की पहचान बनकर रह जाती हैं? क्या ग्रामीणों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि पंचायत को मिलने वाला बजट कहां और कैसे खर्च होता है?

सरकार हर ग्राम पंचायत को सिर्फ़ सफाई के लिए ही न्यूनतम 1 लाख रुपए प्रतिवर्ष देती है तो सवाल उठता है कि यह पैसा वास्तव में खर्च कहां होता है? क्या इसका कोई हिसाब सार्वजनिक रूप से ग्रामसभा में बताया जाता है? अगर नहीं, तो ग्रामीण क्यों चुप हैं?

क्या ग्रामीणों को पता हैं कि उनके गांव को मिलने वाला कुल बजट सीधे-सीधे जीएसटी डेटा से जुड़ा होता है? जब गांव के लोग दुकानों से बिना बिल के सामान खरीदते हैं, तो उससे सरकार को मिलने वाला राजस्व भी कम हो जाता हैं और जब गांव से कम राजस्व का आंकड़ा सरकार तक पहुंचता है, तो पंचायत के बजट की मांग भी कमजोर हो जाती है। क्या ग्रामीण जानते हैं कि बिल न लेने का नुकसान उन्हीं की सुविधाओं पर पड़ता है?

गांव की दुकानों से बिना बिल खरीदना क्या सिर्फ़ एक आदत है? या यह गांव के विकास के रास्ते में खुद ग्रामीणों द्वारा खड़ी की गई दीवार है? यदि ग्रामीण ही बिल नहीं लेंगे, तो सरकार कैसे जानेगी कि इस गांव में आर्थिक गतिविधि कितनी है? और जब गांव के आर्थिक आँकड़े ही कमजोर दिखाई देंगे, तो पंचायत के बजट के लिए मजबूती से आवाज़ कैसे उठाई जाएगी?

क्या ग्रामीणों ने कभी अपने पंचायत प्रशासक, बीडीओ या सरपंच से पूछा कि पिछले एक साल में स्वच्छता मद में मिले 1 लाख रुपए किस-किस तारीख को, कहाँ, किन कामों में खर्च किए गए? क्या गांव में कभी एक भी जन-सुनवाई इस विषय पर हुई?

क्या पंचायत कार्यालय में खर्च का विवरण सार्वजनिक सूचना बोर्ड पर चिपकाया जाता है? अगर नहीं, तो ग्रामीण इसकी मांग क्यों नहीं करते?

क्या यह सच नहीं कि ग्रामीणों की निष्क्रियता ही कई बार प्रशासन की ढिलाई को ताकत देती है? क्या यह सही नहीं कि हक तभी मिलता हैं जब लोग खुद अपने हक के लिए सवाल पूछते हैं, प्रमाण मांगते हैं और पारदर्शिता की अपेक्षा मजबूती से रखते हैं?

अब समय आ गया हैं कि ग्रामीण सोच बदले। दुकान से सामान खरीदें तो बिल ले। ग्रामसभा में जाएं। सवाल करे—पैसा कहां आया, कहां गया, कितना खर्च हुआ, कितना बचा?

गांव का विकास मनरेगा, पंचायत, जिला परिषद या सरकार के भरोसे नहीं हो सकता—विकास तो तब शुरू होता हैं जब ग्रामीण जागते हैं, जागरूक होते हैं और जिम्मेदारी से अपने अधिकार की मांग करना सीखते हैं। तो सवाल यह है—क्या ग्रामीण अब जागेंगे या गांव की समस्याएँ उसी तरह अगले दस वर्षों का ‘यथास्थिति पत्र’ बनकर अख़बारों में छपती रहेंगी?

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