सना खान
एक छोटे से कस्बे में रहने वाला निखिल अपने पिता की किराने की दुकान संभालता था। उसके पिता हमेशा कहा करते थे, ‘बेटा, सच बोलना मुश्किल हो सकता है, लेकिन झूठ की कीमत हमेशा ज्यादा होती है।’ एक दिन दुकान का हिसाब मिलाते समय निखिल से बड़ी गलती हो गई। कुछ पैसे कम पड़ गए। उसे डर था कि पिता नाराज होंगे। घबराकर उसने कह दिया, ‘शायद किसी ग्राहक ने ज्यादा पैसे वापस ले लिए होंगे।’ पिता ने उसकी बात पर भरोसा कर लिया। लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
अगले दिन उस ग्राहक पर शक किया गया। लोगों ने उसके बारे में तरह-तरह की बातें करनी शुरू कर दीं। वह बार-बार कहता रहा कि उसने कुछ गलत नहीं किया, लेकिन किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। निखिल सब देखता रहा। हर दिन उसका अपराधबोध बढ़ता गया, लेकिन अब सच बोलना पहले से कहीं अधिक कठिन लगने लगा। एक झूठ को बचाने के लिए उसे दूसरा झूठ बोलना पड़ा, फिर तीसरा। कुछ दिनों बाद दुकान का पुराना हिसाब दोबारा देखा गया। तब पता चला कि गलती किसी ग्राहक की नहीं, बल्कि हिसाब लिखते समय हुई थी। दुकान में सन्नाटा छा गया।
निखिल की आंखें झुक गर्इं। वह पिता के सामने खड़ा होकर बोला, ‘मुझसे गलती हुई थी। अगर उसी दिन सच कह देता, तो किसी बेगुनाह को शक की निगाह से नहीं देखा जाता।’ पिता ने गहरी सांस ली और बोले, ‘बेटा, गलती से ज्यादा नुकसान उस झूठ ने किया, जो उसे छिपाने के लिए बोला गया। सच देर से सामने आया, लेकिन तब तक कई लोगों का भरोसा टूट चुका था।’ निखिल ने समझा कि झूठ का सबसे बड़ा नुकसान सच छिपाना नहीं, बल्कि भरोसा खो देना होता है। उसकी एक बात ने एक बेगुनाह पर शक पैदा किया, कई लोगों की सोच बदल दी और उसके अपने मन का सुकून भी छीन लिया।
एक झूठ कभी अकेला नहीं चलता। वह अपने साथ शक, डर और अविश्वास भी ले आता है। इसलिए गलती स्वीकार करने में भले ही एक पल की हिम्मत लगती हो, लेकिन झूठ को ढोने में पूरी जिंदगी की बेचैनी लग सकती है।
