उमन गुप्ता
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के लिए बारिश केवल खुशियां ही नहीं, बल्कि आफत भी लेकर आती है। हर साल मानसून शुरू होते ही सड़कें समंदर का रूप ले लेती हैं और रेलवे ट्रैक पानी में डूब जाते हैं। इतना ही नहीं, शहर की रफ्तार मानी जाने वाली लोकल ट्रेनें भी पटरियों पर खड़ी नजर आती हैं।
दुनिया की सबसे समृद्ध नगरपालिकाओं में शुमार मुंबई महानगरपालिका हर साल नालों की सफाई और ड्रेनेज व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’ रहता है। हालांकि, यह कोई नई समस्या नहीं है। इसके पीछे अंग्रेजों के दौर का पुराना ड्रेनेज ढांचा, शहर की भौगोलिक बनावट और मानवीय लापरवाही जैसी कई वजहें जिम्मेदार हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान यह ड्रेनेज सिस्टम उस समय की अपेक्षाकृत कम आबादी और प्रति घंटे केवल २५ मिलीमीटर सामान्य बारिश को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। आज जलवायु परिवर्तन के कारण मुंबई में कुछ ही घंटों में १०० मिलीमीटर से अधिक बारिश हो जाती है। ऐसे में करीब डेढ़ सौ साल पुराना यह ढांचा पूरी तरह जवाब दे देता है।
अतिक्रमण से नदियां बनीं नाला
टाउन प्लानिंग एक्सपर्ट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय शिरोडकर कहते हैं कि कुर्ला और मीठी नदी के आसपास के इलाकों में केवल तेज बारिश ही बाढ़ की वजह नहीं होती। मीठी नदी और उससे जुड़े नालों की बदहाल स्थिति भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। हर साल मानसून से पहले नदी और नालों से गाद निकालने का काम किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद हर बारिश में यहां जलभराव की समस्या बनी रहती है। इसके साथ ही नदी पर बढ़ता अतिक्रमण और पानी निकासी की घटती क्षमता भी बाढ़ का खतरा बढ़ा देती है। उनका कहना है कि जिस दिन से नदी नाले में तब्दील हुई है, उसी दिन से यह समस्या लगातार बढ़ती चली गई है।
