के.पी. मलिक
कभी अयोध्या भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चुनावी मंच थी। हर चुनाव में राम का नाम गूंजता था, हर रैली में मंदिर का वादा दोहराया जाता था और हर भाषण में आस्था को राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता था। वर्षों तक यह कहा गया कि मंदिर बनते ही इतिहास का एक अधूरा अध्याय पूरा हो जाएगा। लेकिन मंदिर बनने के बाद कहानी समाप्त नहीं हुई वास्तव में यहीं से एक नई कहानी शुरू हुई है, जिसमें सबसे बड़ा प्रश्न मंदिर नहीं, बल्कि उसके नाम पर वोट की फ़सल काटने वाले, उसके प्रबंधन करने वालो की जवाबदेही है?
आज अयोध्या की गलियों में यदि कोई सबसे महत्वपूर्ण सवाल सुनाई देता है तो वह यह नहीं कि मंदिर कितना भव्य बना, बल्कि यह कि उस भव्यता का लाभ किसे मिला? करोड़ों श्रद्धालुओं ने विश्वास के साथ दान दिया था। उन्होंने र्इंट या पत्थर नहीं, अपनी आस्था समर्पित की थी। इसलिए यदि ट्रस्ट के कामकाज, दान के प्रबंधन या प्रशासनिक निर्णयों पर सार्वजनिक सवाल उठते हैं, तो उन्हें राजनीतिक शोर कहकर टालना पर्याप्त नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विश्वास की रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम पारदर्शिता है, नारों की ऊंची आवाज नहीं।
अयोध्या के अनेक स्थानीय निवासी विकास को स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चमकती सड़कों और विशाल गलियारों के पीछे ऐसे परिवार भी हैं, जिनकी दुनिया बदल गई। कुछ व्यापार बदले, कुछ घर उजड़े, कुछ लोगों को नए अवसर मिले तो कुछ स्वयं को हाशिए पर महसूस करते हैं। कुछ लोग, जो स्वयं को भगवान राम के वंशज बताते हैं, यह शिकायत करते हैं कि मंदिर के नाम पर बदली अयोध्या में उनकी आवाज पहले जैसी नहीं सुनी जाती। इन दावों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है, लेकिन यदि ऐसे अनुभव सामने आ रहे हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है कि उन्हें सुने, न कि उन्हें केवल असुविधाजनक प्रश्न मानकर नजरअंदाज कर दे।
सबसे दिलचस्प विडंबना यह है कि वर्षों तक जनता से कहा गया कि राम मंदिर राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बनेगा। आज वही जनता पूछ रही है कि क्या राष्ट्रीय स्वाभिमान का अर्थ यह भी नहीं कि सार्वजनिक दान से चलने वाली संस्था अपने कामकाज के बारे में अधिकतम पारदर्शिता दिखाए? यदि करोड़ों लोगों की श्रद्धा से बना संस्थान है, तो करोड़ों लोगों का यह अधिकार भी है कि वे उसकी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल पूछ सकें और उन्हें स्पष्ट उत्तर मिलें। राजनीतिक गलियारों में यह आरोप भी लगातार सुनाई देता है कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े प्रभावशाली संगठन अब भी ट्रस्ट के निर्णयों पर पर्याप्त प्रभाव रखते हैं। इन आरोपों से संबंधित पक्ष असहमति जता सकते हैं, लेकिन प्रश्न बना रहता है कि क्या निर्णय प्रक्रिया इतनी खुली है कि संदेह अपने आप समाप्त हो जाएँ? लोकतंत्र में संस्थाएं अपने समर्थकों से नहीं, अपनी पारदर्शिता से मजबूत होती हैं।
भारतीय राजनीति का यह भी एक विचित्र स्वभाव है कि चुनाव के समय राम सबसे बड़े नायक बन जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही राम के नाम पर उठने वाले कठिन प्रश्न अक्सर असुविधाजनक लगने लगते हैं। जब मंदिर बन रहा था तब हर वैâमरा अयोध्या की ओर था; अब जब प्रबंधन और जवाबदेही पर बहस हो रही है, तो अनेक पक्ष चाहते हैं कि चर्चा सीमित रहे। लेकिन लोकतंत्र में प्रश्न पूछना न तो आस्था का अपमान है और न ही राष्ट्र-विरोध। उलटे, बिना प्रश्नों के कोई भी संस्था धीरे-धीरे आलोचना से ऊपर और जवाबदेही से दूर होती चली जाती है।
बहरहाल, राम भारतीय परंपरा में मर्यादा, न्याय और सत्य के प्रतीक हैं। इसलिए उनके नाम पर बनी किसी भी संस्था की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी भव्यता नहीं, बल्कि उसका नैतिक आचरण होना चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों से खारिज किया जाना चाहिए; यदि कहीं कमियां हैं तो उन्हें स्वीकार कर सुधारना चाहिए। यही मर्यादा की राजनीति होनी चाहिए थी, यही राम के आदर्शों का सम्मान भी था, जिसको नहीं किया गया। अंतत: अयोध्या का असली प्रश्न मंदिर के पत्थरों का नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद का है। श्रद्धा को राजनीतिक पूंजी बनाया जा सकता है, लेकिन उसे स्थायी विश्वास में बदलने का एक ही रास्ता है और वह पूर्ण पारदर्शिता, निष्पक्ष जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास का सम्मान है। क्योंकि इतिहास यह नहीं पूछेगा कि मंदिर कितना ऊंचा था; इतिहास यह भी पूछेगा कि उसके शिखर के नीचे खड़ी संस्थाएं अपने नैतिक दायित्व पर कितनी खरी उतरीं।
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)
