मुख्यपृष्ठस्तंभरूसी राष्ट्रपति पुतिन की अमरता की चाहत

रूसी राष्ट्रपति पुतिन की अमरता की चाहत

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शिवपुरी, म.प्र.

पिछले साल चीन की राजधानी बीजिंग की एक सैन्य परेड के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कान में कहा था, ‘इंसान अपने खराब अंगों को बदलकर अमरता प्राप्त कर सकता है। दुनिया ने तब इन दो वृद्ध नेताओं के बीच हुई बातचीत को सामान्य गपशप माना था, लेकिन अब सामने आए ताजा दस्तावेजों ने दुनिया को हैरानी में डाल दिया है। ७३ साल के पुतिन आजकल रूस में करीब २.१५ लाख करोड़ रुपए का एक बेहद गोपनीय और महत्वाकांक्षी परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने के प्रयास में लगे हैं। इस अभियान का एकमात्र लक्ष्य पुतिन और उनके बूढ़े होते करीबियों की उम्र को थामकर अमर बनाना है। ‘न्यू हेल्थ प्रिजर्वेशन टेक्नोलॉजीज’ नाम दिया है। इस राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के तहत विशेष प्रजाति के लघु सूअर के शरीर में इंसानी अंग उगाने से लेकर रक्त जमा देने वाली ‘शीत चिकित्सा’ (क्रायोथैरेपी) यानी ठंडे तापमान से उपचार करने का उपाय हो रहा है। जिससे जब चाहे तब शरीर के प्राकृतिक रूप से खराब हो रहे अंगों को बदला जा सके? पुतिन अपने शरीर को चुस्त बनाए रखने के लिए ११२ डिग्री सेल्सियस ठंडे पानी में बिना कपड़ों के घंटों खड़े रहते हैं। पुतिन की इस परियोजना को उनकी चिकित्सक बेटी मारिया वोरोत्सोवा और उनके भरोसे के चिकित्सा विज्ञानी मिखाइल कोवलचुक संभाल रहे हैं। २०३० तक अमरता के इस अभियान को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित है।
जैविक सॉफ्टवेयर और बुढ़ापे की कोडिंग
जीव चिकित्सा विज्ञान अब केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि कोशिकाओं के कायाकल्प और जेनेटिक रिपेयर के जरिए जैविक उम्र को थामने की दिशा में बढ़ रहा है। हमारे शरीर की कोशिकाओं में एक ‘बायोलॉजिकल सॉफ्टवेयर’ होता है, जो तनाव, प्रदूषण और बढ़ती उम्र के कारण ‘बग्स’ (त्रुटियों) का शिकार हो जाता है। कंप्यूटर प्रोग्राम की तरह ही इन कोडिंग गलतियों के कारण कोशिकाएं अपनी कार्यप्रणाली भूलने लगती हैं। वैज्ञानिक अब जीन विशेषज्ञ के रूप में इन गड़बड़ियों को ठीक करके जैविक सॉफ्टवेयर को रीसेट करने के उपाय खोज रहे हैं।
यामानाका कारक और वैश्विक अनुसंधान
इस दिशा में डॉ. शिन्या यामानाका द्वारा खोजी गई ‘स्टेम सेल’ तकनीक और ‘यामानाका कारक’ क्रांतिकारी साबित हो रहे हैं। यह तकनीक परिपक्व वयस्क कोशिकाओं को पुन: सक्रिय (रीप्रोग्राम) कर भ्रूण जैसी अवस्था में ले जाती है, जिससे जैविक घड़ी पीछे घूम जाती है। इसी शोध को आगे बढ़ाने के लिए ‘अल्टोस प्रयोगशाला’ में जेफ बेजोस जैसे अरबपतियों ने भारी निवेश किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से थक चुकी कोशिकाओं के व्यवहार को सुधारा जा रहा है, ताकि अंग खुद को भीतर से ही युवा और स्वस्थ बना सकें।
भारत की बड़ी उपलब्धि: नैनो मशीनों से कायाकल्प
भारत भी इस ‘डीप टेक’ और मौलिक विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार है। कोलकाता के युवा विज्ञानी डॉ. दिब्येंदु दास ने प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से जीवित और बौद्धिक कोशिकाएं विकसित करने में अद्वितीय सफलता हासिल की है। इस शोध के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ‘शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। डॉ. दिब्येंदु का दृष्टिकोण: ‘हमारा लक्ष्य ऐसी प्रणालियां और नैनो मशीनें विकसित करना है, जो इंसानी बाल से हजारों गुना छोटी हों। ये शरीर के भीतर जाकर सीधे गंभीर बीमारियों को खत्म करेंगी और बुढ़ापे वाली कोशिकाओं का उपचार कर उन्हें पुन: जवानी में बदल देंगी।’

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