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साहित्य शलाका : मार्क्सवाद बनाम हिंदी साहित्य : विचारधारा, संघर्ष और सृजनशीलता का त्रिकोणीय संबंध

प्रो. दयानंद तिवारी
हिंदी साहित्य का विकास भारतीय समाज की बहुविध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम रहा है। इस विकास में मार्क्सवाद एक महत्वपूर्ण वैचारिक शक्ति के रूप में उभरता है, जिसने साहित्य को सामाजिक यथार्थ से जोड़ने, वर्ग-चेतना को प्रखर बनाने और शोषित वर्गों के संघर्ष को साहित्य के केंद्र में लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। प्रश्न यह नहीं कि ‘हिंदी साहित्य मार्क्सवाद के पक्ष में है या विपक्ष में’, बल्कि यह कि दोनों के मध्य वैâसा संबंध निर्मित हुआ सहयोग, चुनौती, संघर्ष या वैचारिक वर्चस्व? इसी प्रश्न के भीतर ‘मार्क्सवाद बनाम हिंदी साहित्य’ का विमर्श आकार ग्रहण करता है।
मार्क्सवाद का बौद्धिक आधार और साहित्यिक प्रयोजन
मार्क्सवाद मूलत: आर्थिक-सामाजिक संरचना का सिद्धांत है, परंतु इसका प्रभाव संस्कृति, कला, साहित्य, आलोचना और इतिहास तक विस्तृत है। इसके मुख्य आधार हैं।
ऐतिहासिक भौतिकवाद
समाज का विकास आर्थिक आधार (उत्पादन संबंध, उत्पादन शक्तियां) द्वारा संचालित होता है।
वर्ग संघर्ष
इतिहास शोषक और शोषित वर्गों के संघर्ष का इतिहास है।
विचारधारा के रूप में सत्ता का नियंत्रण
सत्ताधारी वर्ग अपनी हितकारी विचारधारा को ‘सामान्य/सत्य’ के रूप में स्थापित करता है।
साहित्य का सामाजिक दायित्व
साहित्य को शोषण-विरोधी चेतना का वाहक होना चाहिए, केवल सौंदर्य नहीं, परिवर्तन महत्वपूर्ण है।
यह दृष्टि साहित्य को सौंदर्य की परिधि से निकालकर सामाजिक संघर्षों के केंद्र में लाती है। हिंदी साहित्य ने इसी चेतना से कई दिशाएं ग्रहण कीं।
हिंदी साहित्य में मार्क्सवादी प्रभाव:
प्रगतिवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिंदी साहित्य में मार्क्सवाद का सबसे संगठित रूप प्रगतिशील लेखक संघ (१९३६) के माध्यम से सामने आया। प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण में स्पष्ट कहा गया
‘साहित्य का कार्य केवल मनोरंजन नहीं, जीवन-संघर्ष में मनुष्य का मार्गदर्शन करना है।’
यहां मार्क्सवादी दृष्टि के निम्न आयाम प्रमुखता से उभरे सामंतवाद और पूंजीवाद की आलोचना
किसान-मजदूर जीवन का यथार्थ चित्रण
सामाजिक विषमता के विरुद्ध प्रतिबद्धता
साहित्य को जन-चेतना का माध्यम बनाना
कला का जनपक्षीय और परिवर्तनकारी रूप
प्रगतिवाद किसी एक लेखक का आंदोलन नहीं था, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का उभार था।
प्रमुख लेखकों की दृष्टि में मार्क्सवाद
(१) प्रेमचंद
‘गोदान’, ‘कफन’, ‘रंगभूमि’ में किसान-जीवन, आर्थिक शोषण और औपनिवेशिक व्यवस्था का यथार्थ चित्रण सीधे मार्क्सवादी संवेदना से जुड़ता है। प्रेमचंद का यथार्थवाद लोक-जीवन की करुणा और संघर्ष दोनों को अभिव्यक्ति देता है।
(२) नागार्जुन
उनकी कविता सीधे किसान-मजदूर के संघर्ष में उतरती है।
‘भूख-भूख, बस भूख की कथा।’
उनका तेवर प्रतिरोध का जन-स्वर है।
(३) त्रिलोचन, रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल
ये कवि भाषा के लोकतांत्रिक रूप, श्रम की प्रतिष्ठा और वर्गीय संघर्ष के सिद्धांत को साहित्यिक रूप देते हैं। रामविलास शर्मा ने आलोचना में मार्क्सवादी दृष्टि को सैद्धांतिक रूप दिया।
(४) मुक्तिबोध
उनकी कविता ‘अंधेरे में’ मध्यवर्ग की वैचारिक दुविधा, समाज-नियंत्रण, आतंक और पूंजीवादी संकट का मार्मिक और तीखा विश्लेषण है। मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद को भावभूमि ही नहीं, चिंतन की नैतिक कसौटी बना दिया।
(५) धूमिल
उनकी भाषा लोकतांत्रिक है, व्यंग्यप्रधान है और सत्ता-संरचना के खोखलेपन को उद्घाटित करती है।
‘सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।’
मार्क्सवाद द्वारा हिंदी साहित्य को प्राप्त महत्वपूर्ण योगदान
(१) साहित्य का सामाजिक सरोकार सुदृढ़ हुआ
मार्क्सवाद ने साहित्य को जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने पर बल दिया।
किसान, मजदूर, स्त्री, आदिवासी-ये वर्ग साहित्यिक विमर्श के केंद्र में आए।
(२) यथार्थवाद का प्रबल रूप
छायावाद की भावुकता से आगे बढ़कर प्रगतिवादी काव्य-कहानी ने जमीनी सच्चाइयों को उद्घाटित किया। यह यथार्थवाद मात्र वर्णनात्मक नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी था।
(३) भाषा और शैली का लोकतंत्रीकरण
साहित्यिक भाषा अभिजात्य या संस्कृतनिष्ठ न होकर जनभाषा बनी।
बोली-बानी
खड़ी बोली का स्थानीय रूप
व्यंग्य, व्यावहारिक शब्दावली
जनमुहावरे
यह लोकतंत्रीकरण हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
(४) रचनाकार का सामाजिक उत्तरदायित्व
मार्क्सवाद ने लेखक को यह बोध कराया कि साहित्य केवल कला-सुख नहीं, बल्कि इतिहास और समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी भी है।
मार्क्सवाद बनाम हिंदी साहित्य : विरोध, तनाव और आलोचना

यहां ‘बनाम’ शब्द अपनी पूर्ण क्षमताओं के साथ उभरता है, क्योंकि कुछ बिंदुओं पर दोनों के बीच स्पष्ट टकराव दिखाई देता है।
(१) साहित्य की स्वतंत्रता बनाम विचारधारा का आग्रह
मार्क्सवाद अक्सर साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का औजार मानता है। इससे रचनाकार पर विचारधारात्मक दबाव पड़ सकता है।
साहित्य का स्वभाव बहुवादी है, जबकि मार्क्सवाद अक्सर एकरेखीय्ा।
(२) अध्यात्म, प्रेम और प्रकृति की उपेक्षा
हिंदी साहित्य की परंपरा में अध्यात्म, रहस्यवाद और प्रेम महत्वपूर्ण हैं।
मार्क्सवादी आलोचना ने इन्हें ‘वर्गीय विमर्श से असंबद्ध’ कहकर कभी-कभी खारिज किया।
इससे साहित्य की भावभूमि का एक बड़ा हिस्सा हाशिए पर चला गया।
(३) भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलता का सरलीकरण
मार्क्सवाद यूरोपीय औद्योगिक संदर्भों में विकसित हुआ।
भारतीय समाज की जटिलताएं-जाति, वर्ण, धर्म, संयुक्त परिवार, ग्राम-व्यवस्था-
महज वर्ग-संघर्ष के माध्यम से नहीं समझी जा सकतीं। हिंदी साहित्य की परंपरा इन बहुधा-आयामी संरचनाओं को अधिक सूक्ष्मता से देखती है।
(४) रचनात्मकता और कलात्मकता पर दबाव
जब साहित्य माध्यम से अधिक ‘घोषणा’ बन जाता है, तो कलात्मक तत्वों का क्षरण संभव हो जाता है।
कुछ आलोचकों ने प्रगतिवाद को ‘स्लोगनवाद’ कहकर इसकी आलोचना की।
मार्क्सवाद, उत्तर-आधुनिकता और समकालीन हिंदी साहित्य
आज का हिंदी साहित्य बहु केंद्रीय है।
सिर्फ वर्ग संघर्ष नहीं, बल्कि-
स्त्रीवादी दृष्टि
आदिवासी साहित्य
उपभोक्तावादी संस्कृति
वैश्वीकरण
डिजिटल अर्थव्यवस्था
पहचान आधारित राजनीति
-ये सभी विमर्श साहित्य को नए आयाम देते हैं।
मार्क्सवाद इन विमर्शों से टकराता भी है और कभी-कभी उनके साथ जुड़ता भी है।
समकालीन लेखक केवल वर्गीय शोषण नहीं, बल्कि जाति-शोषण, लैंगिक असमानता, मानसिक दासता और सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को भी देख रहे हैं।
इसलिए मार्क्सवाद अब अकेला वैचारिक प्रâेम नहीं, बल्कि एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा है।
संघर्ष नहीं, सार्थक संवाद
‘मार्क्सवाद बनाम हिंदी साहित्य’ का विवाद वास्तविकता में दो चरमों की टकराहट नहीं, बल्कि साहित्य की स्वतंत्रता और विचारधारा की उपयोगिता के बीच संतुलन का प्रश्न है।
हिंदी साहित्य ने मार्क्सवाद से सीखा
शोषण का वैज्ञानिक विश्लेषण
वर्गीय चेतना
परिवर्तन का संकल्प
यथार्थ का साहसी चित्रण
जनपक्षीय दृष्टि
और मार्क्सवाद ने हिंदी साहित्य से सीखा

भारतीय समाज की सांस्कृतिक जटिलताएं
भाषा की विविधता
भावनात्मक-आध्यात्मिक गहराई
मनुष्य के भीतर छिपी करुणा और संवेदना
इस प्रकार यह संबंध प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि एक निरंतर संवाद, चुनौती और समृद्धि का संबंध है।
हिंदी साहित्य की आत्मा वैचारिक दायरे से हमेशा बड़ी रही है और यही उसे जीवित, गतिशील और बहुआयामी बनाती है।
प्रोफेसर दयानंद तिवारी

 

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