शीतल अवस्थी
अमावस्या तिथि मनुष्य की जन्मकुंडली में बने हुए पितृदोष-मातृदोष से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ तर्पण, पिंडदान एवं श्राद्घ के लिए अक्षय फलदायी मानी गई है। शास्त्रों में इस तिथि को ‘सर्वपितृ श्राद्घ’ तिथि भी माना गया है। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण घटना है- देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ जो सोमपथ लोक में निवास करते हैं, उनकी मानसी कन्या ‘अच्छोदा’ नाम की एक नदी के रूप में अवस्थित हुई। एक बार अच्छोदा ने एक हजार वर्ष तक निर्बाध तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्य शक्तिपरायण देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ अच्छोदा को वरदान देने के लिए दिव्य सुदर्शन शरीर धारण कर आश्विन अमावस्या के दिन उपस्थित हुए। उन पितृगणों में ‘अमावसु’ नाम के एक अत्यंत सुंदर पितर की मनोहारी छवि, यौवन और तेज देख कर अच्छोदा कामातुर हो गईं और उनसे प्रणय निवेदन करने लगीं।
किंतु अमावसु ने अच्छोदा की काम प्रार्थना को ठुकरा कर अनिच्छा प्रकट की। इससे अच्छोदा बहुत लज्जित हुईं और स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरीं। अमावसु के ब्रह्मचर्य और धैर्य की सभी पितरों ने सराहना की एवं वरदान दिया कि यह अमावस्या की तिथि ‘अमावसु’ के नाम से जानी जाएगी, जो प्राणी किसी भी दिन श्रद्घ न कर पाए, वह केवल अमावस्या के दिन श्राद्घ-तर्पण करके सभी बीते चौदह दिनों का पुण्य प्राप्त करते हुए अपने पितरों को तृप्त कर सकता है, तभी से प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है और यह तिथि ‘सर्वपितृ श्राद्घ’ के रूप में भी मनाई जाती है। (उसी पाप के प्रायश्चित हेतु कालांतर में यही अच्छोदा महर्षि पराशर की पत्नी एवं वेदव्यास की माता बनी थीं। तत्पश्चात समुद्र के अंशभूत शांतनु की पत्नी हुईं और दो पुत्र चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य को जन्म दिया था। इन्हीं के नाम से कलयुग में ‘अष्टका श्राद्घ’ मनाया जाता है।)
