डाॅ. रवीन्द्र कुमार
यह ऐसा क्यूं होता है कि बाहर गांव के डिपार्टमेंटल स्टोर को देख कर हम हिंदुस्थानियों की लार टपकने लगती है। उंगलियां फड़कने लगतीं हैं। क्या हमें पता नहीं होता कि वहां कदम-कदम पर सी.सी.टी.वी. लगे रहते हैं और आप हरदम उसकी जद में रहते हो। जबकि वहां बाउंसरनुमा सिक्यूरिटी भी होती है। उनके क़ानून भी बहुत सख्त होते हैं। जैसे आप गोरी चमड़ी से हिंदुस्थान में आतंकित हो जाते हो वैसे ही वे लोग हम ब्राउन, यलो, ब्लैक को देख कर, मोटा मोटा कहें तो एशियन को देख कर शंकित हो जाते हैं। वे जानते हैं “डेव कुछ तो गड़बड़ है !” ये कुछ तो भानगड़ करेगा। मैंने सुना है वहां होटल/रेस्टौरेंट चला रहे पाकिस्तानी और बंगलादेशी भी अपने आप को इंडियन बताते हैं। कारण कि चेहरा मोहरा एक से होते हैं। यद्यपि चीन, जापान, कोरिया वाले अलग पहचान में आ जाते हैं। हमारी तो आदतें भी एक सी हैं। जैसे यहां-वहां थूकना। सड़क चलते कुछ भी इधर-उधर फेंक देना। जोर-जोर से मोबाइल फोन पर बात करना। दांत फाड़ कर हंसना। घूरना।
फिर ऐसा क्या लालच घेर लेता है हमें कि हम इतना बड़ा रिस्क लेकर कपड़े, हों, खाने का सामान हो, यहां वहां छुपा लेते हैं। ये सोच कर कि कोई नहीं देख रहा। एक कहावत है कि प्रेमी जोड़ा समझता है जग अंधा है जबकि सच ये है कि जहां से वे गुजर जाते हैं अंधे को भी पता चल जाता है। इसी तरह उनकी तेज़ नज़रें और सी.सी.टी.वी. मिल कर सब उघाड़ देते हैं। उन्हें पता नहीं सिखाते हैं कि नहीं हमारे देश में तो शुरू से ही बच्चों को सिखाया जाता है चोरी करना पाप है और झूठ नहीं बोलना चाहिए इससे कान पक जाते हैं। ऐसे ही कुछ और सीख किताब में डालनी चाहिए जैसे घूरने से आंख आ जाती है। चोरी की कोई चीज़ खाने से पेट में भयंकर दर्द होता है आदि आदि। जैसा मैं मानता हूं और कहता हूं हमारे मआशरे में रोल मॉडल की बहुत कमी है। अकाल पड़ा हुआ है। किसे देख कर आप कहेंगे कि बेटा बड़े होकर ऐसे बनना। अतः सौ बातों की एक बात कह देते हैं बेटा बड़े होकर खूब पैसा कमाना। पैसा सब चीज़ ज्स्टीफ़ाई कर देता है। फिर साधन (माध्यम) गौण हो जाता है। उस बंदे को सक्सेसफुल कहा जाता है। रिसोर्सफुल कहा जाता है। अगला भी हवा में आ जाता है और यदाकदा कुछ चेरिटी जैसी चीज़ कर देता है।
हां, तो डिपार्टमेंटल स्टोर, वो भी विदेश के। जो आपको पहले ही हेय दृष्टि से देखते हैं उनके स्टोर में चोरी, फिर पकड़े जाने पर आप रियायत की उम्मीद करते हैं। एक बात और बताओ आप क्यूं नहीं पकड़े जाने पर कह देते कि आप बंगलादेश से हो या पाकिस्तान से हो। या फिर उन्होने कोई ऐसी बिधी निकाल ली है कि वो आपको देख कर ही पहचान लेते हैं कि आप खालिस हिंदुस्थानी हो। मुझे कोई बता रहा था कि आप यदि सड़क पर थूकते हैं तो ये शुद्ध हिन्दुस्थानी ट्रेट है। पर ऐसे तो कई पैरामीटर हो सकते हैं। यथा पब्लिक में खुजाना, दूसरे के फोन में झांकना, लपक के सीट पकड़ना और किसी और को न बैठने देना। क्यू तोड़ने का जुगाड़ लगाना। बात बात पर आर्गु करना।
ताज्जुब की बात है कि ये शॉप लिफ्टिंग के केसों में हमारी फिल्मी तारिकाएं तक पकड़ी जाती हैं। फिर कहानी सुनाती हैं मैं तो ये समझी थी…मैं तो वो समझी थी… ओह ! वो कुछ मिसअंडरस्टेंडिंग हो गयी थी…मेरी शक्ल उनकी डाटा बेंक में दर्ज़ किसी चोर से मिलती जुलती थी। हम जानते हैं ज़न्नत की हकीकत। मुझे पता नहीं वो फाइन लगाते हैं या जेल में रखते हैं। हम कहीं चले जाएं अपना हिंदुस्थानी पना नहीं भूलते। दुख की बात है कि वहाँ जाकर भी हम ऑनर किलिंग कर रहे हैं। चोरी, हत्या, ड्रग्स सबमें बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी रखते हैं। डिपार्टमेंटल स्टोर की चोरी रोकने का एक उपाय ये है कि उनको सीधा एयरपोर्ट ले जाकर घर वापसी करा दी जाए। और ब्लैक लिस्ट कर दिया जाये। पर फिर हम और कहाँ जाएंगे ? यहीं चोरी का सुभीता होता तो बाहर ही क्यूं जाते। जितना बड़ा मन में अभावों का गड्ढा रखोगे उतना ही बड़ा लालच और उसी गति से मन उद्वेलित होगा। उंगलियां फड़केंगी। चोरी करना पाप है। दाऊ शेल नॉट कोवेट…टेन कमांडमेंट्स में से एक है, पर फिर वही बात:
कसूर मेरा नहीं रोटी की कसम
भूख की दुनिया में ईमान बदल जाता है।
