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सटायर : कोहिनूर की वापसी

डॉ. रवींद्र कुमार
मेरे भारत महान में नागरिकों की देश भक्ति फड़क रही है। हे अंग्रेजों! हमारा कोहिनूर वापस लौटाओ। कोहिनूर हमारे देश की धरोहर है। गरीबों की सुनो! वो तुम्हारी सुनेगा! तुम एक कोहिनूर दोगे वो दस लाख देगा। कोहिनूर के बिना हम गौरवहीन हैं। हमारा गौरव हमें दे दे ठाकुर…! सोचो अगर कहीं अंग्रेजों को हम पर तरस आ गया और दयावश कोहिनूर वापस कर दिया तो? तो…तो क्या होगा? सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों में इसी बात को लेकर मार-काट मच जाएगी कि इसे लेने कौन जाएगा? विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री? रक्षा मंत्री या खान मंत्री? फिर अधिकारी अपनी-अपनी सीनियरिटी का रोना लेकर कूद पड़ेंगे। कहने को तो डायमंड इज वुमन का बेस्ट प्रâेंड। साथ में पुलिस जाएगी या मिलिटरी? इतना आसान नहीं है कि टहलते हुए गए और कोहिनूर उठा लाए या फिर कुरियर से मंगा लिया।
इस पर वैâबिनेट के ५३ सदस्यीय एक मिनी शिष्टमंडल के जाने की बात तय पाई गई। क्योंकि आजकल इकॉनमी चल रही है इसलिए १५३ को काट-पीटकर मात्र ५३ करना पड़ा। विपक्ष को ले चलें या छोड़ें। महिलाएं, पिछड़े-अगड़े शामिल किए गए। कुछ धावक और खिलाड़ी सूची में सम्मिलित होने से रह गए, जो चारों ओर खामाख्वाह शोर मचाते घूम रहे हैं और अनाप-शनाप भाई-भतीजावाद का आरोप लगा रहे हैं। ये तय पाया गया है कि एक चार्टर्ड फ्लाइट से पूरा का पूरा लश्कर महीने भर को जाएगा। लगे हाथों वहां के तथा यूरोप के अन्य शहरों के म्यूजियम की सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा भी लेगा, ताकि यहां सरकार को रिपोर्ट सौंपी जा सके। रिपोर्ट लिखने के आवश्यक प्रशिक्षण हेतु एक नया दल जाने की तैयारी की शॉपिंग में व्यस्त है।
कौन से दिन कोहिनूर भारत की सरजमीं पर उतरे? सत्ता पक्ष के पार्टी अध्यक्ष के जन्मदिवस पर या विपक्ष के नेता की बरसी पर। टी.वी. पर कई दिनों तक ज्योतिषियोेंं, न्यूमरोलोजिस्ट और टैरो कार्ड वाले धमाल मचाते रहे साथ ही तर्कशास्त्री अलग दुहाई दे रहे हैं, किसी भी दिन किसी भी घड़ी कोहिनूर उतारो, न भी आए तो वांदा नहीं।
कम्यूनिस्टों का कहना है कोहिनूर सामंतवादी और बुर्जुआ सोच का प्रतीक है। मजदूर विरोधी विचार है। यह सरकार मजदूर विरोधी है।
बहुजनों का कहना है `ये सरकार मनुवादी है। अब तो यह कोहिनूरवादी भी हो गई है। कोहिनूर खान से किसने निकाला गरीब शोषित खानकर्मियों ने इसलिए इस पर उनकी पार्टी का पहला हक है।’
महाराष्ट्र में एक अलग तरह का विवाद उफान पर था। सारी उम्र शिवाजी महाराज मुगलों से लोहा लेते रहे और कोहिनूर कोई और ले जाए वे सहन नहीं करेंगे।
कोहिनूर रखा कहां जाएगा? हरगिज दिल्ली में नहीं। वहीं से तो गायब हुआ था। फिर वहीं दे दो। नादिरशाह जैसे ‘बाहर गांव’ के तो बाद में आएंगे, उससे पहले अंदर के लोगों ने ही ले उड़ना है। फिर बैठाते रहना एक के बाद एक जांच समिति। हमारे यहां जल विवाद, बांध विवाद, सीमा विवाद, इतने सारे विवादों के चलते सरकार यह गंभीरता से सोच रही है कोहिनूर जहां है वहीं अच्छा है। यहां लाकर क्यों बेकार में फजीहत कराई जाए। यहां फजीहतों या फजीहत करनेवालों की कोई कमी है क्या?

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