सुरेश मिश्र
ललना कहिया अइहैं न
संगम तट पर श्रद्धालुओं का तांता लगा है। कहीं भागवत कथा हो रही है तो कहीं रामलीला-रासलीला का मंचन। इधर गांव में रहने वाली बूढ़ी मां और बाप रास्ता जोह रहे हैं कि बेटा परदेस से आएगा और हम दोनों को तीर्थराज प्रयाग ले जाकर डुबकी लगवाएगा। पूरी तैयारी करके बैठी मां बेटे का रास्ता देखते हुए छुप-छुप कर रोती और बहू से बार-बार पूछती कि हमरा लल्ला कब अइहैं। नायिका से मां का दर्द देखा न गया, उसने परदेसी प्रियतम को फोन किया-
माई जोहत बाइन, तोहरी डगरिया
ललना कहिया अइहैं न
हम प्रयागराज जइबे, ललना कहिया अइहैं न
सगरे कल्पवासिया लगावइं रोज डुबकी
तहरा क याद कइके माई भरइं सिसकी
हिचकी से रोवइ जइसे सगरी बखरिया
ललना कहिया अइहैं न
हम प्रयागराज जइबे, ललना कहिया अइहैं न
गांउ भरके बुढ़ए निसरिगै कल्पवसिया
सासु मां के चेहरा पे छाइल बा उदसिया
झोरवा म धइके जोहइं आपन वो लुगरिया
ललना कहिया अइहैं न
दुनिया क देवी-देवता आइल हउवें घटवा
संत अउ महंत सब देखावइं आपन ठठवा
धूनी रमाए हउवें भेष धइ पुजरिया
ललना कहिया अइहैं न
केकरा से बोली, हमरा लइ चला त्रिवेनी हो
छुपि-छुपि रोवइं, चले जियरा पे छेनी हो
पैदर ही चली जातीं, होत जउ उमरिया
ललना कहिया अइहैं न
कोहिरा परत हउवे, छाइल बा बदरिया
गउवां म सूझे नाहीं केहू के डगरिया
कटकटाए दंतवा, बहेला जब बयरिया
ललना कहिया अइहैं न
तनिके बतावा, ओनके केतना समुझाई हो
देखि-देखि हमरा क आवेला रोवाई हो
माई क कर्जवा भुलावा जिनि संवरिया
ललना कहिया अइहैं न
