द्विजेंद्र तिवारी मुंबई
पिछले सप्ताह चंडीगढ़ पूरी तरह से स्लम प्रâी घोषित हो गया। प्रशासन ने दावा किया कि यह भारत का पहला शहर है, जहां अब एक भी झोपड़पट्टी नहीं है। इसके बाद से यह चर्चा शुरू हुई कि क्या मुंबई जैसा विशाल शहर स्लम प्रâी किया जा सकता है। यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अगले कुछ महीनों में मुंबई महानगरपालिका चुनाव हैं। मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहनेवाले लाखों मतदाता इस चुनाव में हमेशा की तरह निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
झोपड़ों में करोड़ों लोग
दुनिया भर में झोपड़पट्टियां तेजी से बढ़ते शहरीकरण, आर्थिक असमानता और असंतुलित विकास का पर्याय बन गई हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में लगभग सौ करोड़ लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं। ये घनी आबादी वाले उपेक्षित इलाके एशिया, अप्रâीका और लैटिन अमेरिका के शहरों में पैâले हुए हैं, जो सरकारों और योजनाकारों दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत और विशेष रूप से मुंबई शहरी असमानता के सबसे ज्वलंत उदाहरणों में से एक है।
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में आबादी डेढ़ करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। इनमें से ६५ फीसदी से ज्यादा आबादी झुग्गियों में रहती है। इसका मतलब है कि लगभग एक करोड़ लोग बुनियादी नागरिक सुविधाओं के बिना, बेहद भीड़भाड़ वाली अनियोजित बस्तियों में रह रहे हैं। एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी में मात्र दो वर्ग किलोमीटर में लगभग १० लाख लोग रहते हैं।
कहने को तो झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) वर्षों से काम कर रहा है, पर इसके कामकाज से कोई संतुष्ट नहीं है। स्लम प्रâी का सपना दिखाकर बिल्डर लॉबी पराया माल अपना करने में लगी है। बार- बार अदालतों के निर्देशों के बावजूद कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं हो रहा है।
पिछले वर्ष ही मुंबई हाई कोर्ट ने कहा था कि मुंबई एक अंतर्राष्ट्रीय शहर और हमारे देश की आर्थिक राजधानी है, जिसे झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त होना जरूरी है। हमें एक पूर्णत: झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त शहर बनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि अधिनियम के प्रावधानों का कार्यान्वयन सरकार का दायित्व है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसरण में अधिनियम का ‘परफॉरमेंस ऑडिट’ करने के लिए हाई कोर्ट ने सुनवाई रखी थी। शीर्ष अदालत ने अधिनियम के तहत कामकाज को लेकर चिंता जताई थी।
मुंबई पर फोकस नहीं
सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि अगर प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) पूरे भारत में दो करोड़ घर बनाने का लक्ष्य रख सकती है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और टैक्स राजस्व में सबसे ज्यादा योगदान देनेवाले शहर मुंबई के लिए २० लाख घर क्यों नहीं बनाए जा सकते।
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई लंबे समय से गंभीर आवास संकट, झुग्गी-झोपड़ियों की बढ़ती संख्या और महंगी रियल एस्टेट से जूझ रही है। करों और आर्थिक उत्पादन में हजारों करोड़ रुपए का योगदान देने के बावजूद शहर के आम नागरिक, खासकर कामकाजी और सबसे कम आय वर्ग बदतर हालात में रह रहे हैं।
अगर केंद्र और राज्य सरकारें मुंबई-अमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसी एक बुनियादी ढांचा परियोजना के लिए एक लाख करोड़ रुपए आवंटित कर सकती हैं तो मुंबई में २० लाख किफायती घर बनाने के लिए पांच-सात वर्षों में पांच लाख करोड़ रुपए क्यों नहीं जुटाए जा सकते? बुलेट ट्रेन सीमित आबादी को लाभ पहुंचाएगी, लेकिन अच्छा आवास झुग्गी-झोपड़ियों और भीड़भाड़ वाली चॉलों में रहनेवाले लाखों लोगों का उत्थान कर सकता है तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान में सुधार ला सकता है।
परिवर्तनकारी निवेश
शहरी आवास में निवेश कोई खर्च नहीं है, यह एक परिवर्तनकारी निवेश है। यह रोजगार पैदा करता है, निर्माण और उससे जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देता है और शहर की सबसे बड़ी सामाजिक और नागरिक समस्याओं का समाधान करता है। वैश्विक छवि, उत्पादकता, स्वच्छता, कानून-व्यवस्था और नागरिक कल्याण के संदर्भ में यह निवेश किसी भी प्रतिष्ठित परियोजना से कहीं अधिक है।
यह तभी हो सकता है जब सरकारें दिखावे से ज्यादा लोगों को प्राथमिकता दें। अब यह लगभग साबित हो चुका है कि एसआरए अपने मकसद में नाकाम हो चुका है। इसे भंग करके अब एक नई व्यवस्था या नीति की जरूरत है।
मुंबई में आवास विकास का एक साहसिक प्रयास दूसरे शहरों के लिए एक आदर्श बन सकता है। अगर भारत सचमुच एक विकसित राष्ट्र बनना चाहता है तो उसके सबसे अमीर शहर में सबसे खराब जीवन स्तर नहीं होना चाहिए।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
