गुजरात हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है और गुजरात सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि अदालत की ओर से पारित कोई भी ‘झकझोरने वाला आदेश’ न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कमजोर करता है। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने गुजरात हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण (जीआरटी) के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष से जुड़ा है। गुजरात हाई कोर्ट ने सितंबर २०२४ में एक आदेश जारी कर राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह प्रभारी अध्यक्ष को ‘प्रशासनिक छुट्टी’ पर भेजने के निर्देश जारी करे। हाई कोर्ट ने पाया था कि अध्यक्ष ने साल २०२४ में एक ही मामले में देरी माफी (कॉन्डोनेशन ऑफ डिले) को लेकर दो बिल्कुल ‘विपरीत आदेश’ पारित किए थे। अप्रैल २०२४ में उन्होंने २२ साल की देरी के कारण मामले में हस्तक्षेप से इनकार किया, लेकिन मई २०२४ में बिना किसी अलग आवेदन के देरी को माफ कर दिया। हाई कोर्ट ने दोनों आदेशों को खारिज करते हुए अधिकारी को छुट्टी पर भेजने को कहा था।
प्रभारी अध्यक्ष ने हाई कोर्ट के इसी पैâसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा, ‘अगर आप कोई गलत आदेश पारित करते हैं, तो वह स्वीकार्य है… लेकिन अगर आप ऐसा आदेश पारित करते हैं जो चौंकाने वाला हो, तो इससे न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा डगमगा जाता है।
अधिकारी का पक्ष और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारी एक सेवानिवृत्त जिला जज हैं और उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा है। दोनों पैâसलों में विरोधाभास को वकील ने महज एक ‘त्रुटि’ बताया।
