शीतल अवस्थी
श्री रामचंद्रजी के चले जाने से राजा दशरथ बहुत दु:खी हुए। वे रोते-रोते कैकेई का महल छोड़कर कौशल्या के भवन में चले आए। उस समय नगर के समस्त स्त्री-पुरुष और रनिवास की स्त्रियां फूट-फूटकर रो रही थीं। श्रीराम ने चीरस्त्र धारण कर रखा था। वे रथ पर बैठे-बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुंचे। वहां निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत-सत्कार किया। श्री रघुनाथजी ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह दोनों रात भर जागकर पहरा देते रहे। प्रात:काल श्रीराम ने रथ सहित सुमंत्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा-पार हो वे प्रयाग में गए। वहां उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहां से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किया। चित्रकूट पहुंच कर उन्होंने वास्तुपूजा करने के अनंतर (पर्णकुटी बनाकर) मंदाकिनी के तट पर निवास किया। रघुनाथजी ने सीता को चित्रकूट पर्वत का रमणीय दृश्य दिखलाया। इसी समय एक कौए ने सीताजी के कोमल श्री अंग में नखों से प्रहार किया। यह देख श्रीराम ने उसके ऊपर सींक के अस्त्र का प्रयोग किया। जब वह कौआ देवताओं का आश्रय छोड़ कर श्रीराम की शरण में आया, तब उन्होंने उसकी केवल एक आंख नष्ट करके उसे जीवित छोड़ दिया। श्रीराम के वन गमन के पश्चात छठे दिन की रात में राजा दशरथ ने कौशल्या से पहले की एक घटना सुनाई, जिसमें उनके द्वारा कुमारावस्था में सरयू के तट पर अनजाने में यज्ञदत्त-पुत्र श्रवण कुमार के मारे जाने का वृत्तांत था। ‘श्रवण कुमार पानी लेने के लिए आया था। उस समय उसके घड़े के भरने से जो शब्द हो रहा था, उसकी आहट पाकर मैंने उसे कोई जंगली जीव समझा और शब्दवेधी बाण से उसका वध कर डाला। यह समाचार पाकर उसके पिता और माता को बड़ा शोक हुआ। वे बार-बार विलाप करने लगे। उस समय श्रवण कुमार के पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा, ‘राजन, हम दोनों पति-पत्नी पुत्र के बिना शोकातुर होकर प्राण त्याग कर रहे हैं; तुम भी हमारी ही तरह पुत्र वियोग के शोक से मरोगे; (तुम्हारे पुत्र मरेंगे तो नहीं, किंतु) उस समय तुम्हारे पास कोई पुत्र मौजूद न होगा।’
‘कौशल्ये! आज उस शाप का मुझे स्मरण हो रहा है। जान पड़ता है, अब इसी शोक से मेरी मृत्यु होगी।’ इतनी कथा कहने के पश्चात राजा ने ‘हा राम!’ कह कर स्वर्ग लोक को प्रयाण किया। कौसल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इस समय नींद आ गई होगी। ऐसा विचार करके वे सो गईं। प्रात:काल जगाने वाले सूत, मागध और बंदी जन सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किंतु वे न जगे। तब उन्हें मरा हुआ जान रानी कौसल्या पृथ्वी पर गिर पड़ीं। फिर तो समस्त नर-नारी फूट-फूटकर रोने लगे। तत्पश्चात महर्षि वसिष्ठ ने राजा के शव को तेल भरी नौका में रखवा कर भरत को उनके ननिहाल से तत्काल बुलवाया। भरत और शत्रुघ्न अपने मामा के राजमहल से निकलकर सुमंत्र आदि के साथ शीघ्र ही अयोध्या पुरी में आए। यहां का समाचार जानकर भरत को बड़ा दु:ख हुआ। कैकेई को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निंदा करते हुए बोले, ‘अरी! तूने मेरे माथे कलंक का टीका लगा दिया। मेरे सिर पर अपयश का भारी बोझ लाद दिया।’ फिर उन्होंने कौशल्या की प्रशंसा करके तैलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयू तट पर अंत्येष्टि-संस्कार किया। तदनंतर वसिष्ठ आदि गुरुजनों ने कहा, ‘भरत! अब राज्य ग्रहण करो।’ भरत बोले, ‘मैं तो श्री रामचंद्रजी को ही राजा मानता हूं। अब उन्हें यहां लाने के लिए वन में जाता हूं।’ ऐसा कहकर वे वहां से दल-बल सहित चल दिए और श्रृंगवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुंचे। वहां महर्षि भारद्वाज को नमस्कार करके वे प्रयाग से चले और चित्रकूट में श्रीराम एवं लक्ष्मण के समीप आ पहुंचे। वहां भरत ने श्री राम से कहा, ‘रघुनाथजी! हमारे पिता महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गए। अब आप अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करें। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाऊंगा।’ यह सुनकर श्री राम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा, ‘तुम मेरी चरण पादुका लेकर अयोध्या लौट जाओ। मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूंगा। पिता के सत्य की रक्षा के लिए चीर एवं जटा धारण करके वन में ही रहूंगा।’ श्रीराम के समझाने पर सदल-बल भरत लौट गए और अयोध्या छोड़कर नंदिग्राम में रहने लगे। वहां भगवान की चरण-पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भली-भांति पालन करने लगे।
