भगवान भरोसे चल रहे स्कूल
१ महीने से बच्चों की शक्ल नहीं देखी
सामना संवाददाता / लखनऊ
स्कूल भगवान भरोसे चल रहे हैं। एक महीने से स्कूल के बच्चों की शक्ल तक नहीं देखी। आधे टीचर्स को बीएलओ की ड्यूटी दे दी गई है और आधे टीचर्स को बीएलओ की मदद करने के लिए लगा दिया गया है। एसआईआर फॉर्म की ऑनलाइन फीडिंग करने के लिए मैं खुद को कमरे में बंद कर लेता हूं। कभी रात के २ बज जाते हैं, कभी सुबह ४ बजे तक काम करना पड़ रहा है। कई टीचर्स मर गए, लेकिन मेरी ही मौत नहीं आ रही…’ वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) कर रहे एक टीचर से बात की तो उनका दर्द छलक पड़ा।
उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूल में टीचर संतोष कुमार जब एसआईआर के बारे में बता रहे थे तो उनका चेहरा मुरझाया हुआ था। थकान साफ दिख रही थी। वे कई दिनों से ठीक से सोए नहीं थे। उनके पास १४,०० वोटर्स की लिस्ट है, जिनमें से १,००० वोटर्स की ऑनलाइन फीडिंग पूरी हो चुकी है, लेकिन अभी भी ४०० लोगों के फॉर्म बाकी हैं। रिश्तेदार की मौत पर आने के लिए नौकरी को रिस्क में डालना पड़ा। ब्लॉक लेवल ऑफिसर की ड्यूटी कर रहे टीचर संतोष कुमार का कहते हैं कि दुनिया के लिए कोरोना वायरस खत्म हो गया, लेकिन बीएलओ के लिए फिर से आ गया है। हम मर रहे हैं, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है। ऊपर से सिर्फ ‘फरमान’ आता है, जिसे मानना ही होगा। वरना आप पर एक्शन होगा, नौकरी भी जा सकती है।
टेंशन की वजह से शुगर कंट्रोल नहीं हो रहा है। वजन तेजी से गिर रहा है। थके-हारे घर पहुंचता हूं तो बच्चे का भविष्य दिखता है इसलिए चुपचाप अपना काम कर रहा हूं। संतोष ने अपने मोबाइल फोन में एक लिस्ट दिखाई, जिसमें एसआईआर की ड्यूटी के दौरान हुईं बीएलओ, सुपरवाइजर और आंगनवाड़ी सेविका की मौत और सुसाइड की कोशिश के आंकड़े थे।
शिक्षक संतोष कुमार ने बताया कि जब वे एसआईआर फॉर्म लेकर घर-घर जाते हैं तो उन्हें दो तरह के लोग मिलते हैं। एक वो जिन्हें लगता है कि अगर उनका नाम २००३ की लिस्ट में नाम नहीं या पेपर पूरे नहीं हैं तो उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। उन्हें या तो बांग्लादेश भेज दिया जाएगा या पाकिस्तान। दूसरे वो जिन्हें एसआईआई से कोई फर्क नहीं पड़ता।
