-मतदाता का नाम जोड़ने-काटने की ताकत आखिर किसके पास?
सामना संवदादाता / नई दिल्ली
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद है। लेकिन जब इसी सूची को तैयार करने और उसमें संशोधन करने वाले डिजिटल सिस्टम के नियंत्रण पर चुनाव आयोग के भीतर ही सवाल उठने लगें, तो मामला केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहता। यह अधिकारियों के अधिकार, पारदर्शिता और मतदाता के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाता है। सवाल है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का वास्तविक नियंत्रण किसके पास है—कानून के तहत अधिकृत अधिकारियों के पास या डिजिटल सिस्टम के संचालन पर नियंत्रण रखने वाली व्यवस्था के पास?
सॉफ्टवेयर के केंद्रीकृत नियंत्रण पर आपत्तियां
पड़ताल के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम में अधिकारों के केंद्रीकरण और जमीनी अधिकारियों की पहुंच सीमित होने को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग दस महीनों में दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग निर्णयों और प्रक्रियाओं पर कम-से-कम १४ बार लिखित टिप्पणियां कीं। आशंका जताई गई कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की कानूनी जिम्मेदारी निभाने वाले निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की भूमिका डिजिटल व्यवस्था के कारण प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इन आपत्तियों का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता सूची में बदलाव अवैध तरीके से किए जाने की पुष्टि हो गई है। इसके लिए संबंधित प्रक्रियाओं और दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
कानून में अधिकार किसके पास?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५० और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, १९६० के तहत मतदाता सूची तैयार करने, दावों-आपत्तियों पर विचार करने और नियमानुसार संशोधन करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों को सौंपी गई है। ऐसे में डिजिटल सिस्टम की भूमिका, उसमें उपलब्ध अधिकारों और फैसलों की जवाबदेही स्पष्ट होना जरूरी है। यदि किसी अधिकारी की पहुंच सीमित होती है या सिस्टम में बदलाव करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, तो यह जानना आवश्यक है कि अंतिम निर्णय कौन लेता है और उसकी निगरानी कैसे होती है।
