अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप सनकी और ढीठ हैं। अब तक उनके फैसलों और पलटबाजियों से यह कई बार साबित हो चुका है। अब प्रेसिडेंट ट्रंप ने एक और पलटी मारी है। उन्होंने सीधे रूस से ही डीजल खरीदना शुरू कर दिया है। कल तक यही ट्रंप दुनिया को हिदायत दे रहे थे कि कोई भी रूस से किसी भी तरह का तेल न खरीदे। अलग-अलग तरीकों से दबाव बना रहे थे। `रूस से तेल खरीदोगे तो खबरदार! टैरिफ लगाकर तुम्हारी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देंगे’, ऐसी धमकियां दे रहे थे। ५० फीसदी से लेकर सौ फीसदी तक आयात शुल्क का चाबुक उन्होंने इसके लिए भारत और चीन समेत कई देशों पर चलाया। खैर, दो महीने पहले खुद ट्रंप महाशय ने ही रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून पर दस्तखत किए। उसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सौ फीसदी तक टैरिफ थोपने का रास्ता उनके लिए साफ हो गया। हालांकि, अब उन्होंने खुद रूस से डीजल खरीदना शुरू कर दिया है। इसके लिए उन्होंने रूस के प्रेसिडेंट पुतिन के साथ समझौता भी किया है। इस समझौते के मुताबिक रूस ने अमेरिका को
तीन लाख टन डीजल
भेजने का वादा किया है। उसी के हिस्से के रूप में ४० हजार मीट्रिक टन डीजल से भरा जहाज अमेरिका के लिए रवाना हो चुका है। इस तीन लाख टन के अलावा नवंबर में ५ लाख टन और आगे १० लाख टन डीजल रूस अमेरिका को देने वाला है। दुनिया को रूसी तेल पर ज्ञान बांटने वाले प्रेसिडेंट ट्रंप ने पुतिन के साथ समझौता भी किया है। इस ट्रंप रूस से करीब १८ लाख टन डीजल खरीदने की `डील’ करके अचानक `सूखे पाषाण’ क्यों हो गए? रूसी तेल खरीदना यानी पाप है और ऐसा करने वालों को `टैरिफ’ का प्रायश्चित करना ही पड़ेगा, ऐसी थानेदारी ट्रंप उठते-बैठते कर रहे थे। फिर आज उन्हें यही `पाप’ क्यों करना पड़ा? ट्रंप ढीठ हैं, इसलिए वे इस ढिठाई पर भी अमेरिकी हित का मुलम्मा चढ़ा रहे हैं। रूस से डीजल खरीदने का फैसला अमेरिका के हित में है, ऐसा राग उन्होंने अलापना शुरू कर दिया है। रूस से किया गया समझौता अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और ट्रक ड्राइवरों के हित में है, ऐसी बहानेबाजी वे कर रहे हैं। बेशर्मी और सहूलियत की पलटबाजियां प्रेसिडेंट ट्रंप की आदत हैं। रूस से डीजल खरीदते समय अमेरिका के शह पर उस देश से लड़ने वाले और इस युद्ध में तबाह हुए यूक्रेन की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसका जरा-सा भी विचार ट्रंप ने नहीं किया होगा। अपना स्वार्थ साधने के लिए जिनके
गले मिले
उन्हीं के गले काटने, दूसरों की गर्दन पर पैर रखकर आगे बढ़ना, यही अमेरिकी हुक्मरानों की नीति रही है। ओबामा के साथ `चाय पे चर्चा’ करने वाले और `केम छो ट्रंप’ कहकर ट्रंप के साथ `गलबहियां’ डालने वाले मोदी की भी बोलती इसी वजह से बंद हो गई है। प्रेसिडेंट ट्रंप तो मोदी से भी पक्के व्यापारी, धोखेबाज और ढीठ हैं। उनके सामने फिलहाल अमेरिका में ईंधन न की महंगाई, गिरती लोकप्रियता और उसका आगामी मध्यावधि चुनाव में नुकसान होने का डर जैसे कई सवाल हैं। उन सभी सवालों का जवाब उन्होंने सीधे रूस के साथ डीजल खरीद का समझौता करके ढूंढ निकाला है। इस बेशर्मी का उन्हें जरा भी अफसोस नहीं है और न ही कोई मलाल है। इस पर यूक्रेन क्या, रूस पर आर्थिक पाबंदियां लगाकर उससे दुश्मनी लेने वाले यूरोपीय देश क्या या उनके `डियर फ्रेंड’ मोदी क्या, बिलबिलाने के अलावा दूसरा कर भी क्या सकते हैं? ट्रंप को यह अच्छी तरह मालूम है। इसीलिए दूसरों से `टैरिफ’ के `चूहे’ खाकर प्रेसिडेंट ट्रंप की ‘बिल्ली’ रूसी बिल्ले को म्याऊं-म्याऊं कर रही है! ढिठाई का दूसरा नाम प्रेसिडेंट ट्रंप है। जाहिर है, भारत के मौजूदा हुक्मरान और प्रेसिडेंट ट्रंप एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
