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शिंदे का सिरदर्द बढ़ा!.. ऑडियो किसका, आवाज किसकी और सच क्या?

-५०० करोड़ रुपए के आरोपों से राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर

सामना संवाददाता / मुंबई

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे-पाटील और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच छिड़ा विवाद केवल ५०० करोड़ रुपए के कथित लेन-देन तक सीमित नहीं है। यह उन दो चेहरों के राजनीतिक संबंधों में आए बड़े बदलाव की कहानी भी है, जो कभी मराठा आरक्षण के मुद्दे पर एक-दूसरे के करीब दिखाई देते थे। अब स्थिति यह है कि जरांगे गंभीर आरोप लगा रहे हैं और शिंदे उन्हें निराधार बताते हुए सबूत मांग रहे हैं।
इस विवाद की शुरुआत समझने के लिए सितंबर २०२३ में लौटना होगा। जालना जिले के अंतरवाली सराटी में पुलिस लाठीचार्ज के बाद मराठा आरक्षण आंदोलन ने जोर पकड़ा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे १४ सितंबर को स्वयं आंदोलन स्थल पहुंचे। उन्होंने जरांगे से बातचीत की और १७ दिनों से जारी उनका अनशन समाप्त कराया। उस समय जरांगे ने सार्वजनिक रूप से शिंदे के नेतृत्व पर भरोसा जताया था। लेकिन यह भरोसा स्थायी नहीं रहा। अक्टूबर २०२३ में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन फिर तेज हुआ। जनवरी २०२४ में मुंबई की ओर बढ़ते आंदोलनकारियों से बातचीत कर शिंदे सरकार ने एक बार फिर टकराव टालने का प्रयास किया। उस दौर में जरांगे का मुख्य राजनीतिक निशाना तत्कालीन उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस थे।
फरवरी २०२४ में परिस्थितियां बदलने लगीं। जरांगे ने फडणवीस पर अपने खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया। शिंदे ने भी जरांगे की बयानबाजी पर आपत्ति जताई। इसके बावजूद दोनों के बीच बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ। वर्ष २०२४ के विधानसभा चुनाव के बाद फडणवीस मुख्यमंत्री बने और शिंदे उप मुख्यमंत्री। अगस्त २०२५ में जरांगे ने मुंबई के आजाद मैदान में फिर अनशन किया। सरकार ने पात्र मराठा परिवारों की कुणबी वंशावली संबंधी दस्तावेजी प्रक्रिया में हैदराबाद गजेटियर के इस्तेमाल से जुड़े कदम उठाए। समझौते के बाद अनशन समाप्त हुआ, लेकिन आरक्षण विवाद पूरी तरह सुलझा नहीं। दोनों नेताओं के बीच दूरी ३१ अगस्त २०२६ को परभणी में खुलकर सामने आई। जरांगे की आपत्ति के बावजूद शिंदे किसानों की एक सभा में शामिल हुए। वहां जरांगे समर्थकों ने काले झंडे दिखाए और नारेबाजी की। यह घटनाक्रम राजनीतिक संबंधों में बढ़ते तनाव का स्पष्ट संकेत था। इसके बाद २० अक्टूबर को बीड की दशहरा सभा में जरांगे ने सनसनीखेज आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कुछ नेताओं से जानकारी मिली है कि शिंदे ने भाजपा नेतृत्व से मराठा आंदोलन शांत कराने के लिए ५०० करोड़ रुपए देने की बात कही थी। जरांगे ने यह सवाल भी उठाया कि क्या कथित रकम शिंदे के पुत्र और सांसद श्रीकांत शिंदे के माध्यम से पहुंचाई गई थी। २१ अक्टूबर को शिंदे ने आरोपों का स्पष्ट खंडन किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने न किसी को ५०० करोड़ रुपए दिए और न किसी से इतनी रकम ली। २२ अक्टूबर को विवाद ने नया मोड़ लिया। जरांगे ने जालना में पत्रकार परिषद आयोजित कर एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की। उनका दावा था कि इसमें २०२४ के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा से जुड़े कुछ लोगों की बातचीत दर्ज है, जिसमें ५०० करोड़ रुपए के कथित भुगतान और उनके आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने की चर्चा है।
रिकॉर्डिंग के पीछे कौन? महायुति में भी उठे सवाल!
विवाद अब महायुति के भीतर भी जांच की मांग तक पहुंच गया है। सांसद नरेश म्हस्के ने आशंका जताई कि कथित रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल शिंदे और जरांगे के बीच अविश्वास पैदा करने के लिए किया जा सकता है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने जरांगे से कहा कि यदि उनके पास ठोस प्रमाण हैं तो वे पुलिस या जिलाधिकारी के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराएं। अब सवाल केवल यह नहीं है कि ऑडियो में किसकी आवाज है। सवाल यह भी है कि रिकॉर्डिंग कब और किसने की।

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