–सरकार की नजरों में सब सामान्य!
-आईटीबीपी प्रमुख की टिप्पणी के बाद जागी केंद्र सरकार; कांग्रेस ने उठाया वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त का मुद्दा
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले चार महीनों से भारत और चीन के सुरक्षा बलों के बीच कथित आमने-सामने की घटनाओं ने केंद्र सरकार के सीमा पर सामान्य स्थिति के दावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर की टिप्पणी के बाद चीन के साथ सीमा पर तनाव का मुद्दा फिर गरमा गया है। केंद्र सरकार ने सफाई दी है कि चीन द्वारा स्थापित गश्त के तौर-तरीकों में बदलाव के कारण ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं। कांग्रेस ने इस स्पष्टीकरण को लेकर सरकार को घेरा है। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने शुक्रवार को प्रेस वार्ता में सवाल उठाया कि क्या भारतीय सुरक्षा बल आज भी उन सभी स्थानों पर गश्त कर पा रहे हैं, जहां अप्रैल २०२० से पहले किया करते थे? यदि स्थिति सामान्य है तो सीमा पर लगातार आमने-सामने की घटनाएं क्यों हो रही हैं?
`देश में एक ‘५६ इंच का चीनी खिलौना’ है’…कांग्रेस का मोदी सरकार पर तीखा हमला
अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच जारी टकराव की भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक द्वारा पुष्टि किए जाने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के खिलाफ तीखा राजनीतिक हमला बोला है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने शुक्रवार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में सरकार की चीन नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि एक तरफ भारतीय सुरक्षा बल सीमा पर चीन का मुकाबला कर रहे हैं, दूसरी तरफ केंद्र सरकार बीजिंग को लगातार आर्थिक और कूटनीतिक रियायतें दे रही है। खेड़ा ने प्रधानमंत्री की बहुचर्चित ‘५६ इंच की छाती’ वाली राजनीतिक छवि पर कटाक्ष करते हुए कहा कि देश को खोखले दावों के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के सवालों पर स्पष्ट जवाब चाहिए। उन्होंने ‘५६ इंच का चीनी खिलौना’ जैसी तीखी टिप्पणी के माध्यम से प्रधानमंत्री की कथित मजबूती और चीन के प्रति सरकारी नीतियों के बीच विरोधाभास दिखाने की कोशिश की।
गलवान के शहीदों के परिवारों से पूछिए, क्या सब सामान्य है?
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने जून २०२० में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक संघर्ष में शहीद हुए २० भारतीय जवानों की याद दिलाते हुए सरकार से सवाल किया कि क्या उनके परिवारों से भी यही कहा जाएगा कि सीमा पर सब कुछ सामान्य है? उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश के सीमा सुरक्षा बल का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं अरुणाचल में जारी टकराव की बात कर रहा है, तब सरकार वास्तविक स्थिति को लेकर देश को पूरी जानकारी क्यों नहीं दे रही? खेड़ा ने सवाल किया कि क्या सरकार ने उन परिवारों की सुध ली है जिन्होंने गलवान में अपने बेटे, पति या पिता खोए थे? कांग्रेस नेता ने कहा कि भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों के साहस पर किसी को संदेह नहीं है। जवान कठिन परिस्थितियों में सीमा की रक्षा कर रहे हैं। सवाल जवानों की बहादुरी का नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों और जवाबदेही का है।
क्या अप्रैल २०२० से पहले वाले गश्ती क्षेत्रों में अब भी जा सकते हैं जवान?
पवन खेड़ा ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय गश्त के अधिकारों को केंद्र में रखते हुए पूछा कि क्या भारतीय जवान आज भी उन सभी स्थानों तक निर्बाध गश्त कर पा रहे हैं, जहां अप्रैल २०२० से पहले किया करते थे? उन्होंने कहा कि सीमा पर टकराव समाप्त होने के सरकारी दावों की वास्तविक कसौटी यही होनी चाहिए कि भारतीय सैनिकों की पहुंच, गश्त और निगरानी के अधिकार पूरी तरह बहाल हुए हैं या नहीं। यदि किसी स्थान पर भारतीय जवानों की पहुंच पहले जैसी नहीं रह गई है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ और उसे बहाल करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गांवों से सामने आ रही चिंताओं का उल्लेख करते हुए पवन खेड़ा ने दावा किया कि स्थानीय लोग चीनी गतिविधियों को लेकर भावुक अपील कर रहे हैं। उनके अनुसार, सीमा क्षेत्र के निवासियों की आशंकाओं को नजरअंदाज करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े वास्तविक सवालों को कमजोर करना है। उन्होंने सरकारी नेताओं के आश्वस्त करने वाले बयानों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि सामान्य स्थिति का दावा करना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि जमीन पर परिस्थितियां कैसी हैं।
चीन के सामने समर्पण करके भारत को आखिर हासिल क्या हुआ?
कांग्रेस प्रवक्ता ने मोदी सरकार की चीन नीति को लेकर सीधे समर्पण का आरोप लगाया। उनका सवाल था कि सरकार ने चीन के प्रति जो नरम रवैया अपनाया है, उससे भारत को आखिर क्या मिला? खेड़ा ने आरोप लगाया कि चीन के साथ आर्थिक संबंधों में रियायतें बढ़ाई जा रही हैं, लेकिन बदले में सीमा पर तनाव समाप्त होने अथवा भारत की रणनीतिक चिंताओं के समाधान का कोई स्पष्ट परिणाम सामने नहीं रखा गया है। उन्होंने कहा कि भारत जैसा शक्तिशाली देश अपनी सेना के साहस, आर्थिक क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के बल पर चीन से बराबरी के स्तर पर बातचीत कर सकता है। फिर ऐसी क्या मजबूरी है कि सरकार चीन की मांगों के अनुसार पैâसले करती दिखाई दे रही है? कांग्रेस नेता के अनुसार, सीमा सुरक्षा और व्यापारिक नीतियों को पूरी तरह अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। यदि एक देश भारत की सीमा पर दबाव बनाए रखता है और उसी समय उसे आर्थिक सुविधाएं दी जाती हैं, तो सरकार को इन फैसलों का औचित्य समझाना चाहिए।
चीनी निवेश, वीजा और व्यापार घाटे पर पांच बड़े सवाल
पवन खेड़ा ने चीन के प्रति केंद्र सरकार की नीतियों में कथित बदलावों का उल्लेख करते हुए कई मुद्दे उठाए। उन्होंने विशेष रूप से प्रेस नोट संख्या तीन के अंतर्गत चीनी निवेश पर लागू प्रतिबंधों में ढील, यात्रा संबंधी पाबंदियों में कमी, चीनी नागरिकों के लिए वीजा सुविधाओं में बढ़ोतरी और लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर सवाल किए। उनका आरोप था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले चीनी निवेश के प्रति सरकार का रवैया बदल रहा है, जबकि सीमा पर चीन की गतिविधियों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। खेड़ा ने दावा किया कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगभग ९९ अरब डॉलर से बढ़कर ११२ अरब डॉलर हो गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि चीन से आयात बढ़ने और व्यापार असंतुलन गहराने का असर भारतीय विनिर्माण उद्योग तथा छोटे और मझोले उद्यमों पर क्यों नहीं देखा जा रहा?
सुरंग खोदने वाली मशीनों पर चीन का शिकंजा
प्रेस वार्ता में सुरंग खोदने वाली अत्याधुनिक मशीनों का मुद्दा भी उठा। खेड़ा ने दावा किया कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाली लगभग ७० प्रतिशत टनल बोरिंग मशीनों के उत्पादन में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक जर्मन कंपनी भारतीय परियोजनाओं के लिए ऐसी मशीनें तैयार कर रही थी, लेकिन चीन के अनौपचारिक दबाव के कारण उनकी आपूर्ति बाधित करने की स्थिति पैदा हुई। कांग्रेस नेता ने इसे भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर चीन के संभावित दबाव का उदाहरण बताया। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ने अक्टूबर २०२६ में सुरंग निर्माण की कुछ विशेष मशीनों और उनसे संबंधित तकनीक के निर्यात पर नए नियंत्रण घोषित किए हैं। ये नियंत्रण १८ नवंबर से प्रभावी होने वाले हैं। ऐसी मशीनें मेट्रो रेल, भूमिगत रेलवे, सुरंगों तथा दूसरी बड़ी निर्माण परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
सीमा पर सच्चाई बताना सरकार की जिम्मेदारी
आईटीबीपी महानिदेशक के बयान ने भारत-चीन संबंधों में एक महत्वपूर्ण सवाल फिर सामने ला दिया है। यदि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर जवानों का आमना-सामना जारी है, तो वहां तनाव की वास्तविक सीमा क्या है? क्या यह केवल गश्त के दौरान आमने-सामने आने की स्थिति है या कहीं लंबे समय से सैन्य गतिरोध भी बना हुआ है? सरकार को इन सवालों का जवाब देना होगा। कांग्रेस ने फिलहाल सरकार के सामने यही राजनीतिक चुनौती रखी है कि सीमा पर सैनिकों की बहादुरी का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है; देश को यह भी बताया जाना चाहिए कि चीन के साथ वार्ताओं से क्या हासिल हुआ, गश्त के अधिकार कितने बहाल हुए और आर्थिक रियायतों के बदले भारत के हितों की रक्षा किस तरह हुई।
