मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : दिल्ली पुलिस की बात ही अलग है!

तरकश : दिल्ली पुलिस की बात ही अलग है!

-धनुर्धर

दिल्ली पुलिस की कार्यकुशलता और तत्परता ने आखिर सबका मन मोह लिया। जुलाई से लेकर अक्टूबर तक-इन तीन महीनों में ही इसने क्राउड कंट्रोल के अलग-अलग पैंतरों के इतने वैरिएशन पेश कर दिए कि कोई भी दांतों तले उंगली दबा ले।
मुंबई पुलिस पीछे छूटी
इसका सही अंदाजा तब होता है, जब आप मुंबई पुलिस से इसकी तुलना करते हैं। मुंबई पुलिस ने अंडरवर्ल्ड का उन्मूलन कर जो नाम कमाया था, उसी की कमाई खा रही है अब तक। हालांकि, उस उपलब्धि में भी लॉरेंस बिश्नोई गैंग की सेंध लगाने लगी है।
चूहा-बिल्ली का खेल
फिर भी, बात क्राइम कंट्रोल की नहीं, क्राउड कंट्रोल की है। क्राइम तो हर जगह की पुलिस कंट्रोल करती ही रहती है। क्राइम भी होता है, पुलिस भी होती है, दोनों एक-दूसरे के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते रहते हैं। अगर बिल्ली सारे चूहों को खा जाएगी या चूहों को अपने इलाके से खदेड़ देगी तो फिर उसकी जरूरत ही क्या रह जाएगी। बिल्ली इस बात को अच्छे से समझती है। पुलिस भी।
संतुलन बना रहता है
इसलिए अपराध उन्मूलन को कभी पुलिस अपना लक्ष्य नहीं बनाती। पुलिस के आका भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। वे पुलिस तंत्र को अपराध नियंत्रण तक सीमित रखते हैं। इस तरह से पुलिस, अपराध और राजनीति सब में संतुलन बना रहता है।
सकारात्मक योगदान
चुनाव वगैरह के दौरान अपराधियों-गुंडों का समाज और देश के हित में सकारात्मक योगदान भी होता रहता है। वे यह सुनिश्चित करने में सहयोग करते हैं कि समाज और राष्ट्र को सही नेतृत्व मिले। यह नेतृत्व जब समाज और देश पर काबिज हो जाता है तो इस बात का ध्यान रखता है कि पुलिस अपराध जगत पर एक हद से ज्यादा हावी न हो जाए, उनमें संतुलन बना रहे।
कोई इनोवेशन नहीं
बहरहाल, बात हो रही थी क्राउड कंट्रोल की। आप देखिए कि मुंबई पुलिस उस मोर्चे पर कोई इनोवेशन नहीं ला सकी है। वही पुराना तरीका कि प्यार मोहब्बत और बातचीत से मामले को सुलझा लिया जाए। भीड़ जिस वजह से भी जुटना चाहे, उसे जुटने दो, उसके साथ सहयोग करो, बस यह देखो कि शांति बनी रहे और सभी लोग सुरक्षित अपने-अपने घर को चले जाएं।
बहुरंगी नजरिया
इसके बरक्स दिल्ली पुलिस को देखिए तो फर्फ एकदम साफ दिखाई पड़ता है। यहां एकरंगा रवैया नहीं होता पुलिस का। उसमें सारे रंग नजर आ जाते हैं। जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर शांति, सहयोग और धैर्य की इंतिहा दिखाती है पुलिस। ऐसे कितने उदाहरण आपको मिलते हैं, जब विदेश से आ रहे प्रदर्शनाकांक्षियों को एयरपोर्ट पर रिसीव कर पुलिस ने उन्हें परमिशन पेश की हो।
सख्ती बेमिसाल
उसके बाद पुलिस रंग बदलती है। अब क्रूरता और बर्बरता दिखाने में भी दिल्ली पुलिस सबको पीछे छोड़ देती है। आप अगर ऐसा नहीं मानते तो देश की किसी भी दूसरी पुलिस का ऐसा कोई उदाहरण दिखा दीजिए, जिसमें उसने लाठी में कीलें लगाकर प्रदर्शनकारियों को ठोका हो।
पहले ही एक्शन
यही नहीं। दिल्ली पुलिस ने शांति रक्षा की नई तकनीक इवॉल्व करके दिखा दिया है इन्हीं तीन महीनों में। अक्टूबर में इसने बताया कि नागरिकों का कुछ गलत करना जरूरी नहीं है। पुलिस हाथ बांधे उनके गलत करने का इंतजार नहीं करते बैठी रह सकती। कुछ गलत करने से पहले ही उनके खिलाफ एक्शन ले लेगी। यही उसने किया भी।
हिरासत में सबक
जंतर-मंतर का प्रदर्शनस्थल बंद कर दिया गया था। वहां पहुंचने पर रोक थी। कोई पहुंचा भी नहीं। लेकिन जंतर-मंतर नाके के आसपास भी जो लोग दिख रहे थे, पूरी तत्परता से उन्हें पुलिस हिरासत में ले लिया जा रहा था। हिरासत में भी इन्हें सबक सिखाने के अतिरिक्त इंतजाम थे। जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा रहा था।
गर पुलिस चाहे
सबसे बड़ी बात तो यह कि इनोवेशन का सिलसिला लगातार चल ही रहा था। दिल्ली पुलिस ने इसके बाद यह भी दिखाया कि पब्लिक प्रॉपर्टी की ट्रेसपासिंग का भी केस बनाया जा सकता है। अभी तक प्राइवेट प्रॉपर्टी की ही ट्रेसपासिंग का मामला बनता था। यह भी साबित हुआ कि पुलिस चाह ले तो तिरंगा लहराना भी अपराध बनाया जा सकता है।
अधिकारों पर बंदिशें
और हां, पुलिस चाहे तो आपसे बॉन्ड भरवाकर एक साल तक की आपकी गतिविधियों पर बंदिशें लगा सकती है, भले ही आप उन गतिविधियों को अपना अधिकार मानते रहे हों और संविधान ने भी आपको उन अधिकारों की गारंटी दे रखी हो।
जा पर तुम्ह अनुकूल
आपको भले आश्चर्य हो रहा हो, दिल्ली पुलिस के इन कारनामों में कोई आश्चर्य नहीं। तुलसीदास जी कह गए हैं ‘ताकहुं प्रभु कुछ अगम नहीं, जा पर तुम्ह अनुकूल…।’ आखिर दिल्ली पुलिस सीधे लौहपुरुष सीजन-२ को रिपोर्ट करती है, उनसे शक्ति लेती है।

(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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