मुख्यपृष्ठनए समाचारजनता के पैसे से सत्ता का प्रचार!

जनता के पैसे से सत्ता का प्रचार!

-सरकारी विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च; योजनाओं की जानकारी जनता तक कितनी पहुंची?
-आवंटन के मानदंड और प्रचार के असर की स्वतंत्र ऑडिट की उठी मांग
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाली सरकार के प्रचार पर कितना पैसा खर्च हो रहा है और इसका वास्तविक लाभ आम नागरिकों को कितना मिल रहा है? यह सवाल अब सरकारी विज्ञापन खर्च के आंकड़ों के बीच चर्चा का विषय है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष २०१४-१५ से २०२४-२५ तक विज्ञापनों पर कुल ५,९८७.४६ करोड़ रुपये खर्च किए। यानी ११ वित्त वर्षों में औसतन करीब १.५ करोड़ रुपये प्रतिदिन विज्ञापन पर खर्च हुए। इतने बड़े खर्च के बीच यह जानना जरूरी है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी कितने लोगों तक पहुंची और विज्ञापन अभियानों से जनता को कितना लाभ मिला।
एक साल में ११९.७९ करोड़ रुपये प्रिंट विज्ञापनों पर खर्च
वित्त वर्ष २०२४-२५ के आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने समाचार पत्रों में विज्ञापन देने पर ११९.७९ करोड़ रुपये खर्च किए। यह राशि १,०५२ समाचार पत्रों में विज्ञापन वितरण के लिए थी। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें से ६३.२३ करोड़ रुपये यानी आधे से अधिक राशि केवल १० बड़े मीडिया समूहों को मिली।
ये आंकड़े सरकारी विज्ञापनों के वितरण और प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा की गुंजाइश पैदा करते हैं। हालांकि, केवल खर्च या किसी मीडिया समूह को मिली राशि के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विज्ञापन का उद्देश्य राजनीतिक प्रचार था। इसके लिए विज्ञापनों की सामग्री, आवंटन के मानदंड और संबंधित अभियानों के परिणामों की जांच जरूरी है।
योजनाओं की जानकारी या छवि निर्माण?
सरकारी विज्ञापन का मूल उद्देश्य नागरिकों तक योजनाओं, सुविधाओं, पात्रता, आवेदन प्रक्रिया और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों की जानकारी पहुंचाना है। यदि कोई विज्ञापन लोगों को किसी योजना का लाभ लेने में मदद करता है, तो सार्वजनिक धन का ऐसा इस्तेमाल उपयोगी माना जा सकता है।
लेकिन सवाल तब उठता है, जब विज्ञापनों पर बड़े बजट खर्च होने के बावजूद उनके प्रभाव का स्पष्ट आकलन सामने नहीं आता। क्या संबंधित विभाग यह बताते हैं कि कितने लोगों तक जानकारी पहुंची? कितने पात्र नागरिकों ने योजना के लिए आवेदन किया? कितने लोगों को वास्तव में लाभ मिला? और विज्ञापन पर खर्च की तुलना में उसका परिणाम कितना प्रभावी रहा?
जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
सरकारी विज्ञापनों पर खर्च करना अपने आप में गलत नहीं है। लोकतंत्र में नागरिकों को सरकारी योजनाओं और सेवाओं की जानकारी देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इस खर्च की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। जनता के पैसे से चलने वाले विज्ञापनों का हिसाब जनता को मिलना चाहिए। कितना पैसा खर्च हुआ, किन माध्यमों को विज्ञापन दिए गए, उनका उद्देश्य क्या था और आम लोगों को उनसे कितना लाभ मिला—इन सवालों के जवाब आंकड़ों और सार्वजनिक दस्तावेजों के आधार पर सामने आने चाहिए।

अन्य समाचार