सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने चुनावी राजनीति के बीच बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के करीब ९.७८ करोड़ मतदाताओं में से २.०७ करोड़ यानी लगभग २१.१५ प्रतिशत मतदाताओं के फॉर्म निर्धारित प्रक्रिया में जमा नहीं हो पाए। इन नामों का २४ अगस्त को जारी होनेवाली ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल न होना तय है। यहां सवाल सिर्फ आंकड़े का नहीं है। सवाल यह है कि जिस लोकतंत्र में एक-एक वोट की कीमत होती है, वहां करोड़ों मतदाताओं को दोबारा अपने अस्तित्व का सबूत देने की नौबत क्यों आई?
एसआईआर मतदाता सूची की सफाई है या लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा?
निर्वाचन आयोग का कहना है कि २४ अगस्त से २३ सितंबर तक दावे और आपत्तियां दाखिल की जा सकती हैं और अंतिम मतदाता सूची २७ अक्टूबर को प्रकाशित होनी है। लेकिन सवाल यह है कि जिस नागरिक का नाम वर्षों से मतदाता सूची में है, जिसने चुनाव में वोट दिया है, उसे फिर से लाइन में क्यों खड़ा होना पड़े?
एसआईआर का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र नामों की पहचान करना है। यह उद्देश्य गलत नहीं है। लेकिन जब हर पांचवां मतदाता ड्राफ्ट सूची से बाहर होने की स्थिति में पहुंच जाए, तब प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आंकड़े बताते हैं कि समस्या का सबसे बड़ा केंद्र महाराष्ट्र के शहरी इलाके हैं। ठाणे में करीब २८.८८ लाख, मुंबई उपनगर में लगभग २६.९९ लाख, पुणे में करीब २८.९९ लाख और मुंबई शहर में लगभग ९.६० लाख फॉर्म जमा नहीं हो पाए और मामला सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र की २५ विधानसभा सीटों पर ४० प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं के फॉर्म जमा नहीं हो पाए, जिनमें १७ सीटें मुंबई महानगर क्षेत्र, सात पुणे और एक नागपुर में है। इन २५ सीटों में कुल १.१० करोड़ मतदाता हैं, जिनमें ४८.१७ लाख यानी ४३.७ प्रतिशत मतदाताओं के फॉर्म का सत्यापन नहीं हो पाया यानी सवाल अब और गंभीर है। क्या महाराष्ट्र के शहरों में मतदाता इतने तेजी से ‘गायब’ हो गए या चुनावी व्यवस्था उन्हें ढूंढ नहीं पाई?
