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बैठ जाओ नहीं तो जमानत होगी रद्द!

सुनील ओसवाल / मुंबई

-विधान परिषद चुनाव में हो गया ‘खेला’
-बैठ जाओ नहीं तो जमानत होगी रद्द!कल तक दहाड़ रहे गोकुल गीते अचानक हो गए शांत
-भाई गणेश गीते म्हाडा केस में बेल पर हैं बाहर

नासिक विधान परिषद चुनाव में बगावत का बिगुल फूंकने वाले गोकुल गीते और गणेश गीते की अचानक बदली रणनीति अब महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई है। जिस गोकुल गीते ने शिंदे गुट के उम्मीदवार नरेंद्र दराडे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था, वही गोकुल गीते अचानक नरम वैâसे पड़ गए? यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से पूछा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, यह केवल राजनीतिक समझाइश या दबाव का मामला नहीं था। पर्दे के पीछे ‘दबाव, डर और कानूनी संदेश’ का ऐसा ताना-बाना बुना गया, जिसने पूरे चुनावी समीकरण ही बदल दिए। सत्ता के गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि बगावत को शांत करने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों का इस्तेमाल किया गया।
पूरे घटनाक्रम का सबसे चर्चित पहलू गणेश गीते से जुड़ा म्हाडा प्रकरण बन गया है। इस मामले में गणेश गीते आरोपी रहे हैं। उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन बाद में मुंबई हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी। अब राजनीतिक हलकों में चर्चा इस बात की है कि जैसे ही विधान परिषद चुनाव में बगावत की संभावना मजबूत हुई, वैसे ही गीते की जमानत रद्द कराने की दिशा में सरकारी स्तर पर हलचल शुरू हो गई।
हराने से आसान बाहर करना
राजनीतिक हलकों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि ‘बागी को हराने से आसान उसे मैदान से बाहर करना था।’ पूरे घटनाक्रम में मंत्री गिरीश महाजन की सक्रियता भी लगातार चर्चा में रही। वहीं शिंदे खेमे के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका था।
रहस्यमय घटनाक्रम
सबसे बड़ा संयोग यह बताया जा रहा है कि १ जून को गणेश गीते ने अपना नामांकन दाखिल किया और उसी दिन उनकी जमानत रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने संबंधी पत्र सामने आया। इस पत्र ने पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बना दिया। राजनीतिक गलियारों में अब सवाल उठ रहे हैं कि यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया थी या फिर बगावत का झंडा उठाने वालों को दिया गया कोई सख्त राजनीतिक संदेश?

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