किसी और से नहीं, खुद से परेशान हो गई,
ज़िंदगी रिश्तों की गुलाम हो गई।
सुबह को ढोते-ढोते शाम हो गई,
तमाम कोशिशें मेरी नाकाम हो गईं।
ज़रूरतें पूरी करते-करते कमर ‘कमान’ हो गई,
जोश-खरोश खप गया सारा, ज़िंदगी बेजान हो गई।
भरी बिरादरी में ज़िंदगी ‘वीरान’ हो गई,
अपनी ही दहलीज़ की ये तो मेहमान हो गई।
ज़िम्मेदारियाँ इतनी कि थकान हो गई,
तपती, सुलगती ज़िंदगी मानो श्मशान हो गई।
कभी उलझन, कभी भटकन, कभी इम्तहान हो गई,
जवाब नहीं, ज़िंदगी ‘सवालिया निशान’ हो गई।
ज़िंदगी मेरी अपनी फ़र्ज़ के नाम हो गई,
परिवार के लिए ‘घिसी-पिटी’, क़र्ज़ के नाम हो गई।
ज़िंदा रखा अब तक, मुझ पर मेहरबान हो गई,
घर के कोने में ‘नकारा पड़ा’ कोई सामान हो गई!
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
