अखबारों में कुछ बचा, जिंदा जमीर आज।
तारीख और वार का, रखते जो अंदाज।।
मौत जमीरों की हुई, कैसी उठी पुकार।
सच को बेचें रोज जो, करते वही प्रचार।।
कलम हुई व्यापार की, बिकने लगे विचार।
सत्ता की चौखट तलक, झुके कई अखबार।।
झूठ सजाकर छापते, बनकर बड़े हुजूर।
सच की आवाजें हुईं, आज बहुत ही दूर।।
टीआरपी की भूख में, मरे रोज ही लाज।
खबरों के बाजार में, बिकता हर अंदाज।।
चमचे बनकर घूमते, कुछ चेहरे दिन-रात।
सच की कीमत घट गई, रचता झूठ प्रभात।।
विज्ञापन के जाल में, बिक गए समाचार।
जनता के विश्वास पर, होता रोज प्रहार।।
फिर भी कुछ उम्मीद की, जलती हुई मशाल।
कुछ चेहरे अब भी रखें, सच का ऊंचा भाल।।
अखबारों में कुछ बचा, जिंदा जमीर आज।
तारीख और वार का, रखते जो अंदाज।।
जो सच लिखने पर अड़े, सहते रोज प्रहार।
उनके दम पर आज भी, जिंदा है अखबार।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
