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कहीं हथिनी, कहीं कबूतर; बड़ी मुसीबत सीएम के सिर! …`प्राणी जाल’ में फंस चुके हैं फडणवीस

सामना संवाददाता / मुंबई
राज्य में इन दिनों जहां एक तरफ महायुति सरकार में भ्रष्टाचार और बड़बोले मंत्रियों के चलते सीएम फडणवीस टेंशन में हैं। दूसरी तरफ राज्य में कहीं हथिनी तो कहीं कबूतरों का मुद्दा भी उनकी मुसीबत बढ़ा रहा है। कोल्हापुर की हथिनी महादेवी तो मुंबई के कबूतरखानों के कबूतर का मुद्दा उनकी राजनीतिक पेंच बन चुका है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो सीएम फडणवीस भले ही राजनीतिक रूप से काफी समझदार हैं, लेकिन यह मुद्दा उन्हें काफी हद तक नुकसान पहुंचाएगा। विपक्ष भी खुलकर सामने न आते हुए इस मुद्दे को मीडिया और सामाजिक रूप से हवा दे रहा है। ऐसे में फडणवीस इस `प्राणी’ राजनीति के जाल में फंसते जा रहे हैं।
बता दें कि महाराष्ट्र के कोल्हापुर में नांदणी मठ की हथिनी महादेवी (जिसे माधुरी के नाम से भी जाना जाता है) को गुजरात के जामनगर स्थित वाइल्ड लाइफ रिहैबिलिटेशन सेंटर (वन्यजीव पुनर्वास केंद्र) `वनतारा’ में कोर्ट के आदेश पर भेजा गया है, लेकिन इसमें उद्योगपति के हस्तक्षेप की संभावना को देखते हुए लोगों ने नाराजगी जताते हुए सड़क पर उतर कर आंदोलन शुरू किया है। उसे वापस लाने की मांग को लेकर ४५ किलोमीटर लंबी मौन पदयात्रा निकाली गई। इस पदयात्रा में हजारों की तादाद में लोग शामिल हुए, जिसमें साधु-संत, सामाजिक, फिल्मी जगत आदि समाजसेवक एवं वन प्राणी प्रेमियों ने भाग लिया।

सीएम के प्रति बढ़ी नाराजगी
गौरतलब है कि वनतारा को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और रिलायंस फाउंडेशन फंड करते हैं। यहां के लोगों ने उक्त कंपनी के प्रति कड़ा विरोध भी व्यक्त किया है। एक दिन पहले नांदणी मठ से शुरू हुई इस पदयात्रा में प्रदर्शनकारी `माधुरी लौटाओ’ और `जियो बॉयकॉट’ लिखी टोपियां पहने हुए थे। लोगों ने हाथी की मूर्तियां और बैनर लेकर महादेवी हथिनी में अपनी आस्था प्रकट की। इस आंदोलन से फडणवीस के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ रही है।

छोड़े गए कबूतरों का क्या होगा?
उधर कोर्ट के आदेश पर मुंबई में कबूतरखानों को बंद किया जा रहा है तो इन छोड़े गए कबूतरों का क्या होगा? ऐसा सवाल उठाते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया है। कभी पंखों की फड़फड़ाहट और कबूतरों की गूंजती आवाजों से गुलजार रहने वाले मुंबई के प्रसिद्ध कबूतरखाने अब धीरे-धीरे बंद किए जा रहे हैं। ये कबूतरखाने कभी मुंबई शहर की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हुआ करते थे।

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