मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : एथेनॉल की दौड़...किसान व अर्थव्यवस्था का सच

विशेष : एथेनॉल की दौड़…किसान व अर्थव्यवस्था का सच

के.पी. मलिक

भारत की ऊर्जा नीति इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता और वैश्विक स्तर पर बदलते भू-राजनीतिक समीकरण इन सबने सरकार को वैकल्पिक र्इंधनों की ओर तेजी से बढ़ने के लिए मजबूर किया है। इसी दिशा में एथेनॉल ब्लेंडिंग को एक बड़े समाधान के तौर पर पेश किया जा रहा है। लक्ष्य स्पष्ट है कि तेल का आयात घटाना, किसानों की आय बढ़ाना और पर्यावरण को राहत देना। लेकिन जब इस पूरी रणनीति को जमीन पर रखकर देखा जाता है तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक नजर आती है।
व्यावहारिकता पर सवाल!
सबसे पहले एथेनॉल की मूल संरचना को समझना जरूरी है। भारत में यह मुख्यत: गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों से बनाया जाता है। यानी यह सीधे-सीधे कृषि पर आधारित र्इंधन है। यहां से पहली समस्या शुरू होती है कि ये सभी फसलें अत्यधिक पानी मांगती हैं। गन्ना तो खासतौर पर ‘पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता’ माना जाता है। एक किलो गन्ना पैदा करने में ही हजारों लीटर पानी खर्च होता है। इसके बाद डिस्टिलेशन प्रक्रिया में भी प्रति लीटर एथेनॉल के लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ती है। इस तरह, एथेनॉल का हर लीटर अपने साथ एक ‘छिपा हुआ जल-खर्च’ लेकर आता है, जिसे नीति-निर्माण में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
भारत जैसे देश में, जहां पहले से ही ६० फीसदी से ज्यादा कृषि क्षेत्र मानसून पर निर्भर है और कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, वहां इस मॉडल के दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में पहले ही जल संकट के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में एथेनॉल के लिए गन्ने की मांग बढ़ाना, आग में घी डालने जैसा कदम हो सकता है। अब अगर चीनी उद्योग के हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो यह संकट और स्पष्ट हो जाता है। वर्ष २०२५–२६ में देश का चीनी उत्पादन २७५.२८ लाख टन तक पहुंचा—जो पिछले साल से अधिक है, लेकिन शुरुआती अनुमानों से काफी कम। महाराष्ट्र, जो इस साल सबसे बड़ा उत्पादक बना, वहां भी उत्पादन उम्मीद से कम रहा। उत्तर प्रदेश में तो उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण गन्ने की पर्याप्त आपूर्ति का अभाव रहा। यह बताता है कि गन्ना उत्पादन अब स्थिर और भरोसेमंद नहीं रहा। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि जब गन्ना उत्पादन खुद अनिश्चितता से जूझ रहा है, तब उसी फसल पर आधारित एथेनॉल विस्तार कितना व्यावहारिक है?
संसाधन क्षमता
दरअसल, एथेनॉल और चीनी के बीच एक सीधा ‘पॉलिसी टकराव’ मौजूद है। जब गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया जाता है तो चीनी उत्पादन घटता है। इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित होती है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है। दूसरी ओर, अगर गन्ना ज्यादा चीनी उत्पादन में जाता है तो एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य प्रभावित होता है यानी सरकार एक ही संसाधन से दो अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करने की कोशिश कर रही है और यही असंतुलन पैदा कर रहा है। चीनी उद्योग की मौजूदा स्थिति इस असंतुलन का सीधा उदाहरण है। बढ़ती लागत, वैâश फ्लो की समस्या और किसानों के बकाया भुगतान ने मिलों पर दबाव बढ़ा दिया है। महाराष्ट्र में ही हजारों करोड़ रुपए का गन्ना भुगतान बकाया है। उद्योग एमएसपी बढ़ाने की मांग कर रहा है, ताकि वित्तीय स्थिति सुधर सके। लेकिन सरकार का तर्क है कि एमएसपी बढ़ाने का मतलब है कि चीनी महंगी होगी, जिसका असर सीधे आम उपभोक्ता पर पड़ेगा। इसी बीच, उद्योग एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाने की भी मांग कर रहा है। E२० के बाद E२२, E२५, यहां तक कि E८५ और E१०० तक जाने की बात हो रही है।
पहली नजर में यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम लगता है, लेकिन इसके लिए जिस मात्रा में कच्चे माल और पानी की जरूरत होगी, वह भारत की मौजूदा संसाधन क्षमता से कहीं ज्यादा है। यहां ऊर्जा दक्षता एक और महत्वपूर्ण पहलू है। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। यानी समान दूरी तय करने के लिए अधिक र्इंधन की जरूरत पड़ती है। इससे उपभोक्ता को वास्तविक बचत उतनी नहीं मिलती, जितनी कागजों पर दिखाई जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम सिर्फ आयात कम करने के लिए एक कम दक्ष विकल्प को बढ़ावा दे रहे हैं? इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा का मुद्दा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चावल और मक्का जैसी फसलों का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में बढ़ने का मतलब है कि खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन पहले ही कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा है, खाद्यान्न को र्इंधन में बदलना एक जोखिम भरा निर्णय हो सकता है। पूरे परिदृश्य को देखें तो यह साफ है कि एथेनॉल कोई ‘सिल्वर बुलेट’ नहीं है। यह एक आंशिक समाधान जरूर हो सकता है, लेकिन इसे मुख्य आधार बनाना कई नए संकटों को जन्म दे सकता है।
असीमित संसाधन
बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यह है कि समाधान क्या हो सकता है? सबसे पहले, नीति को ‘एक फसल, एक समाधान’ की सोच से बाहर आना होगा। गन्ने पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी और मक्का, ज्वार जैसे कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। दूसरी पीढ़ी (२उ) के एथेनॉल जो कृषि अपशिष्ट से बनता है उसे प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि उसमें पानी और जमीन दोनों की मांग कम होती है। इसके साथ ही, इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को समान प्राथमिकता देना जरूरी है। सिर्फ एथेनॉल पर निर्भर रहना रणनीतिक रूप से कमजोर कदम साबित हो सकता है। सबसे अहम बात यह है कि जल प्रबंधन को ऊर्जा नीति के केंद्र में लाना होगा। जब तक पानी को ‘असीमित संसाधन’ मानकर पैâसले लिए जाएंगे, तब तक कोई भी हरित नीति टिकाऊ नहीं हो सकती। अंत में, भारत को यह तय करना होगा कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किस हद तक समझौता करने को तैयार है। क्या हम सस्ते र्इंधन के लिए अपने जल संसाधनों को दांव पर लगा सकते हैं? क्या किसानों की आय बढ़ाने के नाम पर उन्हें एक ऐसे फसल चक्र में फंसा रहे हैं, जो भविष्य में खुद उनके लिए संकट बन सकता है? एथेनॉल की यह दौड़ सिर्फ र्इंधन की कहानी नहीं है बल्कि यह पानी, खेती और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन की परीक्षा है और फिलहाल, यह संतुलन बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है।

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