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बेबाक : बीटेक की डिग्री, चपरासी की नौकरी और दस करोड़ का घोटाला!

 अनिल तिवारी, मुंबई

दीपांशी का अपराध तो अदालत तय करेगी, लेकिन उसकी कहानी ने देश की शिक्षा, रोजगार व्यवस्था और युवाओं की कुंठा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या हम प्रतिभाओं को अवसर देने में नाकाम होकर सामाजिक असंतोष की जमीन तैयार कर रहे हैं?
ग्रेटर नोएडा के पंजाब नेशनल बैंक में सामने आया १०.२४ करोड़ रुपए का कथित घोटाला महज आर्थिक अपराध की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है, जहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाली एक युवती बैंक में चपरासी का काम कर रही थी और अब करोड़ों रुपये की हेराफेरी के आरोप में सीबीआई की गिरफ्त में है। उसका नाम दीपांशी शर्मा है। वह बीटेक पास है। तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बैंक में कार्यालय सहायक यानी सब-स्टाफ के पद पर काम करती थी। इस मामले में उसके सहयोगी आशुतोष कुमार पाठक को भी गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि दोनों ने मिलकर बैंक के ग्राहकों के खातों से करोड़ों रुपए की रकम निकाल ली।
निश्चित रूप से अपराध के लिए क्षमा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। विशेषकर तब, जब उसके शिकार वे किसान और सामान्य खाताधारक बने हों, जिन्हें अपनी जमीन के बदले मुआवजे की रकम मिली थी। किसी की मेहनत, जमीन और जीवनभर की पूंजी हड़पना गंभीर अपराध है। आरोप प्रमाणित होने पर दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन इस घटना को केवल एक अपराधी और उसके अपराध तक सीमित कर देना भी एक बड़ी सामाजिक सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। आखिर बीटेक की डिग्री हासिल करने वाली एक युवती बैंक में चपरासी की नौकरी क्यों कर रही थी?
यही सवाल इस घटना को एक सामान्य आपराधिक समाचार से आगे ले जाता है। जिस युवती ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, तकनीकी विषयों को समझा, परीक्षा उत्तीर्ण की और अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष उच्चशिक्षा प्राप्त करने में लगाए, उसके सामने आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं कि उसे अपनी शैक्षणिक योग्यता से बिल्कुल अलग स्तर की नौकरी करनी पड़ी? क्या उसे आरक्षण के इस युग में बेहतर अवसर नहीं मिले? क्या आर्थिक मजबूरी थी? क्यों प्रतियोगिता में असफलता मिली? या फिर उसने स्वयं इस नौकरी को चुना? इसलिए तुरंत उसकी व्यक्तिगत मन:स्थिति के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यह स्थिति हमारी रोजगार व्यवस्था की गंभीर विसंगति की ओर अवश्य संकेत करती है।
हमारे देश में लाखों युवा इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विज्ञान और अन्य उच्चशिक्षा पाठ्यक्रमों में अपनी जवानी के महत्वपूर्ण वर्ष लगा देते हैं। माता-पिता जीवनभर की बचत खर्च करते हैं। कई परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। इन सबके पीछे एक ही सपना होता है कि शिक्षा उनके बच्चों को बेहतर जीवन, सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक सुरक्षा देगी। लेकिन जब डिग्रियां हासिल करने के बाद भी योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिलते, तो यही सपने कभी-कभी निराशा, असंतोष और कुंठा में बदल जाते हैं। मनोविज्ञान में ऐसी स्थिति को समझने के लिए सापेक्ष वंचना और हताशा जैसी अवधारणाएं महत्वपूर्ण हैं। जब व्यक्ति अपनी शिक्षा, क्षमता और अपेक्षाओं की तुलना वास्तविक उपलब्धियों से करता है और दोनों के बीच बड़ी खाई पाता है, तो उसके भीतर असंतोष जन्म ले सकता है। लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियां बने रहने पर कुछ व्यक्तियों में आत्मसम्मान का संकट, असफलता की भावना और व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि हताशा या योग्यता से कम स्तर के रोजगार को अपराध का अनिवार्य कारण नहीं माना जा सकता। अधिकांश लोग कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी से जीवन जीते हैं। फिर भी सवाल उठता है कि क्या समाज में बढ़ती शैक्षणिक बेरोजगारी और अल्परोजगार ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं, जिनमें कुछ युवा नैतिक और कानूनी सीमाएं लांघने का जोखिम उठाने लगते हैं?
दीपांशी के मामले में एक और विडंबना दिखाई देती है। बैंक की शिकायत के अनुसार, आरोप है कि उसने अन्य कर्मचारियों की लॉगिन आईडी का दुरुपयोग किया, ग्राहकों के खातों में अनधिकृत लेन-देन किए और कुछ मामलों में मोबाइल अलर्ट तक निष्क्रिय कर दिए। बताया गया है कि यह सिलसिला लगभग तीन वर्षों तक चला। इन आरोपों की जांच जारी है। यदि ये आरोप साबित होते हैं, तो यह बैंक की निगरानी और आंतरिक सुरक्षा प्रणाली की भी गंभीर विफलता होगी। लेकिन इसी घटना का दूसरा पहलू भी विचारणीय है। जिस कर्मचारी को व्यवस्था ने सबसे निचले पदों में से एक पर रखा, उसके पास इतनी तकनीकी समझ होने का आरोप सामने आया कि वह बैंक की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठा सकी। यह उसकी प्रतिभा का प्रमाण नहीं, बल्कि तकनीकी ज्ञान के कथित दुरुपयोग का उदाहरण है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह बना रहता है कि आखिर हमारी रोजगार व्यवस्था शिक्षित युवाओं की क्षमताओं को रचनात्मक दिशा देने में कितनी सफल है?
किसी उच्चशिक्षित व्यक्ति का चपरासी की नौकरी करना अपमानजनक नहीं है। श्रम का कोई भी रूप छोटा नहीं होता। असली समस्या नौकरी की गरिमा में नहीं, बल्कि शिक्षा पर किए गए निवेश और उपलब्ध रोजगार के बीच बढ़ती असमानता में है। जब इंजीनियरिंग पढ़ने वाला युवा तकनीकी क्षेत्र में काम नहीं कर पाता, तो यह उसकी व्यक्तिगत समस्या के साथ-साथ शिक्षा और रोजगार नीतियों की प्रभावशीलता पर भी सवाल है। यहां सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज की जवाबदेही शुरू होती है। क्या देश में उच्चशिक्षा का विस्तार रोजगार के अवसरों के अनुपात में हो रहा है? क्या तकनीकी शिक्षा उद्योग की वास्तविक जरूरतों से जुड़ी हुई है? क्या युवाओं को ऐसी डिग्रियां दी जा रही हैं, जिनके अनुरूप पर्याप्त रोजगार ही उपलब्ध नहीं हैं? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या हम बेरोजगारी की गिनती करते समय उन उच्चशिक्षित लोगों की विवशता को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो रोजगार में होने के बावजूद अपनी योग्यता का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं? इस प्रकरण को अपराध और रोजगार के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह कहना गलत होगा कि दीपांशी ने इसलिए कथित घोटाला किया, क्योंकि वह बीटेक पास होकर चपरासी थी। उसके वास्तविक उद्देश्य, आर्थिक परिस्थितियां और आपराधिक इरादे जांच और न्यायिक प्रक्रिया के विषय हैं। लेकिन यह भी गलत होगा कि उसकी शैक्षणिक योग्यता और रोजगार के बीच मौजूद विसंगति को पूरी तरह अप्रासंगिक मान लिया जाए।
अपराध की जिम्मेदारी व्यक्ति की है, लेकिन समाज की जिम्मेदारी उन परिस्थितियों को समझना भी है जिनमें असंतोष, अवसरहीनता और नैतिक विचलन पनप सकते हैं। दीपांशी को न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार उसके कथित अपराध का जवाब देना होगा। बैंक प्रबंधन को भी बताना होगा कि ग्राहकों की जमा-पूंजी तक अनधिकृत पहुंच और संदिग्ध लेन-देन इतने लंबे समय तक कैसे संभव हुए। लेकिन सरकार और नीति निर्माताओं के सामने इससे अलग एक प्रश्न भी खड़ा है, आखिर उच्चशिक्षित युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को उसकी शिक्षा और क्षमता के अनुरूप अवसर कब मिलेंगे?
हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी कही जाती है। लेकिन यदि उसी युवा आबादी की शिक्षा, आकांक्षाओं और रोजगार के बीच खाई बढ़ती गई, तो यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं होगा। इसका असर सामाजिक विश्वास, आत्मसम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति युवाओं के नजरिए पर भी पड़ सकता है। दीपांशी की कहानी को अपराध का महिमामंडन करने के बजाय व्यवस्था के आत्ममंथन का अवसर बनाया जाना चाहिए। क्योंकि किसी अपराधी को सजा देना न्याय व्यवस्था का दायित्व है, लेकिन ऐसी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को सुधारना शासन और समाज का भी दायित्व है, जो भविष्य में जोखिम बढ़ा सकती हैं।
आखिर में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक बीटेक पास युवती कथित तौर पर करोड़ों रुपये के घोटाले में कैसे शामिल हुई। सवाल यह भी है कि जिस देश ने उसे इंजीनियर बनाया, उसकी शिक्षा और क्षमता का सार्थक उपयोग करने के कितने अवसर उपलब्ध कराए? और यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल चार्जशीट या अदालत का फैसला नहीं दे सकता। इसका जवाब देश की शिक्षा नीति, रोजगार नीति और विकास के मॉडल को देना होगा।

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